बुधवार, अगस्त 20, 2008 21:49s

हिंदुस्तान जवान हो गया ....

हिंदुस्तान जवान हो गया है ....ये यंग इंडिया है ....ये वो भारत है जहां गांव से, छोटे शहरों से अपने बूते ,झंडे गाड़े जा रहे हैं । चाहे वो आज के हिंदुस्तान का अर्जुन ,निशानेबाजी में गोल्ड मेडल जीतने वाला अभिनव बिंद्रा हो।

कुश्ती में कांस्य जीते वाले सुशील कुमार हो या फिर मुक्केबाजी में कांस्य पदक जीतने वाले विजेंद्र कुमार। सबने अपने दम पर जीत हासिल की है। कामयाबी के आसमान पर चमकने वाले ये वो सितारे हैं जो खुद तो कुछ नहीं बोलते लेकिन उनकी सफलता ताल ठोंककर कहती है- हां ,हममें है दम।

हम आज के हिंदुस्तानी हैं। हम किसी से नहीं डरते। हम हारने से बचने के लिए नहीं खेलते । हम जीतने के लिए खेलते हैं। हमें हार से डर नहीं, लेकिन हमें जीत से मोहब्बत है।

बात चाहे क्रिकेट की हो या निशानेबाजी की या फिर मुक्केबाजी की । इस यंग इंडिया ने दुनिया को दिखा दिया है - हम मैदान में आ गये हैं। याद रखिए अभी तो सिर्फ शुरुआत है। हर चार साल बाद ओलपिंक आता है और सवा सौ करोड़ का हिंदुस्तान एक अदद मेडल के लिए तरसता रहता था ...लेकिन अब ऐसा नहीं होगा।

अब कमान यंगिस्तान के हाथ में है। अब जब हिंदुस्तान की सवा सौ करोड़ जनता उनसे मेडल की उम्मीद करती है तो जवाब भी वैसा ही आता है - हां, हमसे उम्मीदें करो। हम आपको जीतकर दिखाएंगे। हम आपका सिर गर्व से उंचा करेंगे।

हो सकता है मेरी इन बातों के जवाब में कुछ लोग ये कहें कि इतनी तारीफ अभी ठीक नहीं लेकिन याद रखिए। इन युवाओं ने सोचा तो इन्हें मंजिल मिली। कामयाबी की पहली सीढ़ी है -सोच। उसके बाद आती है मेहनत और फिर होते हैं संसाधन। इस ओलंपिक में मेडल जीतने वाले तीनों युवाओं में ,अगर संसाधन की बात छोड़ दी जाए तो बाकी दोनों बातें एक समान हैं। तीनों की सोच और मेहनत में कोई कमी नहीं।

यहां मैं आपको एक और बात बताना चाहूंगा , भले ही अखिल कुमार क्वॉर्टर फाइनल में जीत नहीं सके लेकिन जिस किसी ने भी वो मैच देखा वो उनके आत्मविश्वास का कायल हुए बगैर नहीं रहा होगा और आप ही बताएं अखिल कुमार के इस बयान को कि 'मेडल तो सिर्फ गोल्ड ही होता है' क्या कहेंगे आप। दरअसल उनकी इस बात में आज का हिंदुस्तान झलकता है।

बात बहुत पुरानी नहीं जब भारतीय खिलाड़ियों की नाकामी के बारे में कहा जाता था -'अरे ये इसलिए पदक नहीं जीत पाते क्योंकि हमारा खानपान दूसरे देशों जैसा नहीं है , शाहकारी भोजन खाकर हम क्या खाक जीतेगें ' इतना ही नहीं ,हिंदुस्तानी खिलाड़ियों के डील डौल के बारे में भी खूब टीका टिप्पणी की जाती थी। लेकिन अब इन सारी चर्चाओं को मुंहतोड़ जवाब दिया गया है।

पदक जीतने से चूके जीतेंद्र कुमार के सामने कोई और नहीं तीन बार का यूरोपीय चैंपियन था। पूरे चार राउंड तक मुकाबला चला। हालांकि जीतेंद्र मुकाबला नहीं जीत सके लेकिन स्कोर था -15-11...यूरोपीय चैंपियन के सामने ये स्कोर किसी भी मायने में कम नहीं था। जो भी बॉक्सिंग के बारे में थोड़ा बहुत जानते हैं वो आसानी से बता सकते हैं पूरे मैच के दौरान अगर कोई चीज अखर रही थी तो वो थी तकनीक। लेकिन इसके बारे में क्या कहा जाए -ये वो सरकारी जंग है जो शायद ही कभी हिंदुस्तान की चारदीवारी का दामन छोड़े। खैर,इसके बारे में तो बात करनी ही बेमानी है लेकिन इन तमाम मुश्किलों के बावजूद कभी ऐसा नहीं लगा कि कभी भी किसी यंग इंडियन का हौसला कमजोर पड़ा हो।

खैर, यहां पदक जीतना या न जीतना अहम नहीं है। अहम है यंग इंडिया का आत्मविश्वास। अहम है वो जज्बा जो किसी भी खिलाड़ी में वो जोश भरता है - वो आत्मविश्वास पैदा करता है कि वो दुनिया में किसी से कम नहीं। खेलों के महाकुंभ में आने वाले खिलाड़ियों में वो सबको हराकर मेडल पर कब्जा जमा सकता है। इस बार ऐसा हुआ भी है - सीना चौड़ा कर न सिर्फ हमने मेडल जीते हैं बल्कि पूरी दुनिया में हुंकार भी गूंजा दी है - हिंदुस्तान जवान हो गया है।

चलते-चलते एक बात और। 20 अगस्त एक और चीज के लिए याद रखा जाएगा। हिंदुस्तान के खेल इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि एक ही दिन हमने दो -दो ओलंपिक पदक जीते और इससे भी बढकर , इन ओलंपिक मेडल्स का स्वाद कुछ ऐसा कि लोग क्रिकेट के बारे में भूल गए। शाबास यंग इंडिया।

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