बिजली-पानी काटी लेकिन मारिया हारे नहीं

TimeMon, Dec 22, 2008 at 15:37 , Updated at Mon, Dec 22, 2008 सिटिज़न जर्नलिस्ट सेक्शन

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मारिया ने अपनी कॉलोनी की पचांयत के गलत फैसलों के खिलाफ आवाज़ उठाई।

मारिया ने अपनी कॉलोनी की पचांयत के गलत फैसलों के खिलाफ आवाज़ उठाई।

    

नई दिल्ली। मारिया बताते हैं कि उनके घर की लाइट डेढ़ साल पहले काट दी गयी। इसलिये मोमबत्तियों के सहारे रात कटती है। और तो और पीने का पानी भी रोक दिया गया है।

उनका घर किसी गांव में नहीं देश की राजधानी दिल्ली में है। वैसे उनके आस पड़ोस के सभी घरों में बिजली और पानी है। लेकिन उन्हें अंधेरे में रहने की सज़ा इसलिये दी जा रही है क्योंकि मारिया ने अपनी कॉलोनी की पचांयत के गलत फैसलों के खिलाफ आवाज़ उठाई। यही नहीं उन्होंने हर उस शख्स का जीना दूभर कर दिया है जो मेरी मदद करना चाहते हैं।

उनके बारे में पुलिस और प्रशासन जानता तो है लेकिन कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है। लेकिन अपनी लड़ाई अकेले लड़ रहे मारिया सलवन हिम्मत नहीं हारे हैं। सिटीज़न जर्नलिस्ट बन कर वो अपनी लड़ाई आगे ले जाना चाहते है।

मारिय सलवन दिल्ली के ताहिरपुर के कस्तूरबा ग्राम कुष्ठ आश्रम में बचपन से रह रहे हैं। यहां कुष्ठ रोगियों के करीब 150 घर है जो इन्हें समाज कल्याण विभाग ने दिए हैं। इस आश्रम में देश का क़ानून नहीं चलता, अगर चलता है तो इस आश्रम की पंचायत के दबंगों का हुक्म। कस्तूरबा ग्राम कुष्ठ आश्रम में रह रहे लोगों ने काफी पहले अपनी एक संस्था यानी पंचायत बनाई थी जिससे यहां के लोगों को सहूलियतें मिल सकें। आपोप है कि धीरे-धीरे पंचायत पर कुछ दबंगों ने क़ब्ज़ा जमा लिया। और अब हालत ये है कि उन लोगों की मर्ज़ी के बिना आश्रम में पत्ता नहीं हिल सकता। वो जिसे चाहे घर से बेदखल कर देते हैं और फिर मोटी रक़म ले कर घर किसी और को सौंप दिया जाता है। और तो और कुछ कुष्ट रोगियों के घरों को कारखानो में बदल दिया है। मनमानी और ज़ुल्म का ये सिलसिला पिछले 10 साल से चल रहा है।

शमसुस्निसा पंचायत के प्रधान की जोर जबर्दस्ती के सामने नही झुकी तो उस पर उलटा आरोप कर निकाल दिया गया। बाकी लोगों की कहानी भी कुछ अलग नहीं है।

मारिया का सवाल है कि कस्तूरबा ग्राम की इस पंचायत को लोगों को बेघर करने का अधिकार किसने दिया। ये कोई अदालत तो नहीं जो ऐसे निर्णय ले सके। उन्होंने पांच कुष्ठ रोगियों के परिवारों को वापस घर दिलाने के लिए समाज कल्याण विभाग और पुलिस अधिकारियों को अर्जियां देनी शुरु की। और इस वजह से वो पंचायत के लोगों की आंखों में खटकने लगे हैं।

2006 में मारिया ने जब एक पंचायत सदस्य के गलत आचरण को लोगों के सामने उजागर किया तो उनके साथ मार पिटाई की गई और सजा के तौर पर उनके घर से बिजली और पानी का कनेक्शन काट दिया गया। आश्रम में ये भी कह दिया गया कि जो उनेस मेल जोल रखेगा या उनकी मदद करेगा उससे 500 रुपए जुर्माना वसूला जाएगा। आज मारिया का घर अंधेरे में डूबा रहता है। पीने का पानी बहुत दूर से भर कर लाना पड़ता है।

मारिया ने बिजली और पानी काटे जाने पर सभी विभागों मे शिकायत की। समाज कल्याण विभाग के अधिकारियों ने कहा कि ये पुलिस का मामला है। पुलिस ने कहा कि ये समाज कल्याण विभाग का मामला है। बिजली विभाग ने कहा जब समाज कल्याण विभाग लिख कर नहीं देगा तब तक बिजली नहीं दी जाएगी। मारिया पिछले ढेड़ साल से विभागों के सिर्फ चक्कर काट रहे हैं और उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही।

यही नहीं आश्रम की पंचायत के पदाधिकारी सरकार की लाखों की सम्पत्ती को नुकसान भी पहुंचा रहे हैं। इस जगह 16 मकान हुआ करते थे। ये मकान पंचायत की मिली भगत से आसामाजिक तत्वों ने गिरा दिए। ईंट और दरवाजे निकाल कर बेच दिए। मारिया ने इसकी जानकारी अधिकारियों को भी दी। यहां तक की सबूत के तौर पर तस्वीरें खीच कर भी दिखाई लेकिन मकानों को बचाने की कोई कार्यवाही नहीं हुई। सवाल ये है कि सरकार के इतने बड़े नुकसान का जिम्मेदार कौन है। क्या इस मामले में लापरवाही बरतने वाले अधिकारी को निकाल नहीं देना चाहिए।

इन्होंने कुष्ठ आश्रम में हो रही अव्यवस्था और अन्याय के खिलाफ जन शिकायत आयोग में आवेदन किया। आयोग ने यहां आकर जांच की। उन्होंने देखा कि प्रधान ने समाज कल्याण विभाग की इजाज़त के बगैर कई क्वार्टरों का निर्माण होने दिया और ऐसे लोगों को दिया जो कुष्ठ रोगी या लाभार्थी है ही नहीं। आयोग ने माना की इनसे प्रधान अच्छी रकम वसूल रहे होंगे। जांच में ये भी पाया गया कि आश्रम के प्रधान ने कई मकानों में गैर कानूनी तरह से व्यवसायिक काम किए जा रहे हैं। अपने निष्कर्ष में आयोग ने लिखा है कि यहां साफ तौर पर सरकारी सम्पत्ती का गलत इस्तेमाल हो रहा है, बिजली की चोरी हो रही है। समाज कल्याण विभाग सही तरह से आश्रम की देखभाल और व्यवस्था करने में नाकामयाब रहा है।

अपने साथ हो रहे अन्याय के खिलाफ मारिया ने लेफ्टीनेट गवर्नर को भी लिखा। एल जी ने उनके आवेदन पर अधिकारियों को 10 दिन में रिपोर्ट देने को कहा।

इस बात को भी अब एक साल से ऊपर हो चला है लेकिन अव्यवस्था के खिलाफ अधिकारियों ने कोई कदम नहीं उठाया है। वो तो इनसे मिलने तक को राजी नहीं होते।

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