घर से भागी बालिका वधू आनंदी

TimeTue, Nov 18, 2008 at 14:09 , Updated at Tue, Nov 18, 2008 मनोरंजन सेक्शन

Tagsटैग: Balika, Vdhu, Mumbai | 0 कमेंट्स

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नन्हीं आनंदी देवी मां पर चढ़ाए पैसे लेकर निकल पड़ती है अपने घऱ की तरफ।

नन्हीं आनंदी देवी मां पर चढ़ाए पैसे लेकर निकल पड़ती है अपने घऱ की तरफ।

            

मुंबई। बालिका वधू आ गई है ससुराल, लेकिन हवेली में कल्याणी देवी यानि मांसा के हुक्म से परेशान है।

सुमित्रा और भैरों आनंदी के लिए भले ठंडी हवा के झोंके जैसे हों। लेकिन भोली आनंदी की हर गलती मांसा के लिए एक नया मौका होता है। मौका बालिका वधू पर जुल्म ढाहने का और इसी सजा की वजह से मासूम आनंदी के दिमाग में हवेली छोड़ देने का ख्याल आता रहता है।

इसी बीच बाल विधवा आशा को चूड़ियां पहनाने की गलती क्या हुई परंपरा और अंधविश्वास का आडंबर ओढ़े मदन सिंह आनंदी पर आग बबूला हो गया।

हवेली में उसका किया हंगामा किसी को बर्दाश्त नहीं हुआ लेकिन बालिका वधू से हुई गलती पर सब चुप रह गए। आनंदी की आशा को दी गई चूड़ियां वहीं फेंक मदन सिंह वापस तो लौट आया, लेकिन उसने हवेली में तूफान खड़ा कर दिया।

आनंदी की इस हरकत पर कल्याणी देवी इतनी गुस्सा हुई कि उन्होंने बालिका वधू के खिलाफ सजा का ऐलान कर दिया। मांसा ने आनंदी को एक कोठरी में बंद कर दिया। नन्ही आनंदी के लिए ये सजा खौफनाक थी।

बंद कमरे से उसकी चीखें सबको सुनाई तो दे रही थीं। लेकिन कल्याणी देवी के हुक्म के आगे हर कोई मजबूर था। सारा घर उस मासूम आवाज को यूं ही घुटने के लिए छोड़ देता है।

हालांकि आनंदी की सजा माफ करवाने की एक कोशिश भैरों सिंह की तरफ से हुई लेकिन माफी की ये आवाज भी रिश्तों का वास्ता दे कर चुप करा दी गई।

अब रात भर आनंदी उसी अंधेरी कोठरी में बंद रहने को मजबूर हो गई क्योंकि बाहर मांसा का पहरा था। कोठरी का स्याह अंधेरा आनंदी पर असर करने लगा और उसकी तबीयत खराब हो गई।

रात भर कोठरी में बंद रही आनंदी को बाहर निकालने के लिए भैरों पहुंचते हैं कल्याणी देवी के पास। कोठरी की पहरेदारी कर रही मांसा आखिरकार बालिका वधू को आजाद करने का हुक्म देती है। लेकिन रात भर की सजा पड़ती है आनंदी को भारी और उसकी तबीयत खराब हो जाती है।

एक तरफ तो आनंदी बीमार पड़ जाती है और दूसरी ओर उसकी जिद हो जाती है घर बिलारिया वापस जाने की। दुख, मजबूरी और गम की इस घड़ी में आनंदी को याद आती है मां। उसके सामने खुशी के वो लम्हे गुजरने लगते हैं जो उसने अपने मां-बाप के साथ बिताए थे। और यही यादें उसे मजबूर करती हैं हवेली की देहरी पार कर जाने के लिए। खुशी के वो पल उसे वापस घऱ लौटने की ताकत देते हैं।

नन्हीं आनंदी देवी मां पर चढ़ाए पैसे लेकर निकल पड़ती है अपने घऱ की तरफ। बाल विवाह की बेड़ियों से छूटी बालिक वधू अपने घर के लिए ऐसे निकलती है मानो उसके पैर में पर लग गए हों। लेकिन जब आनंदी के गायब होने की खबर हवेली में सबको मालूम पड़ती है तो सब परेशान हो जाते हैं।

हवेली की यादों को छोड़ आनंदी निकल पड़ती है नए सफर पर। लेकिन क्या बालिका वधू अकेले अपने घर पहुंच पाएगी, क्या वो हवेली की दहलीज पार कर पाएगी। आखिर क्या होगा आनंदी का। क्या आनंदी की मुलाकात उसके मां-बाप से हो पाएगी।

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