महिलाएं: जाएं तो कहां जाएं?

TimeMon, Nov 17, 2008 at 17:16 सिटिज़न जर्नलिस्ट सेक्शन

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सिटीज़न जर्नलिस्ट शाहना शेख दिल्ली के LSR कॉलेज की छात्रा हैं।

सिटीज़न जर्नलिस्ट शाहना शेख दिल्ली के LSR कॉलेज की छात्रा हैं।

        

नई दिल्ली। सिटीज़न जर्नलिस्ट शाहना शेख दिल्ली के LSR कॉलेज की छात्रा हैं। इनकी लड़ाई महिलाओं से जुड़े एक ऐसे मुद्दे को लेकर है जिस पर किसी का ध्यान नहीं।

दिल्ली में कामकाजी महिलाओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है। नौकरी और दूसरे काम के लिए महिलाएं घंटों घर से बाहर रहती हैं। घर से बाहर उनको शौचालय की सुविधा न मिले तो परेशानियां कई गुना बढ़ जाती हैं।

उन महिलाओं का क्या जिनके पास न तो शौचालय की सुविधा है और न इस सुविधा पर खर्च करने के लिए पैसे। यहां तो बिना पैसे के एक भी शौचालय नहीं है। दो रुपए नहीं हो तो नहीं जाने देते।

शाहना ने महिलाओं की इस परेशानी के बारे में कुछ करने का फैसला किया। शुरुआत हुई दिल्ली के उन इलाकों में जाने से जहां के लोग पूरी तरह सार्वजनिक शौचालयों पर निर्भर हैं। वो झुग्गी-बस्ती इलाके जहां सीवर लाइन नहीं है और घर में शौचालय नहीं बन सकते। MCD ने यहां सार्वजनिक शौचालय बनवाए लेकिन इनकी हालत देखकर शाहना हैरान रह गईं। टूटे दरवाज़े, खुली छत, चारों तरफ़ फैली गन्दगी और पानी का कोई इंतजाम नहीं। Toilet इतना गंदा कि उसमें पैर रखना भी मुश्किल है।

संजय कॉलोनी में 40,000 की जनसंख्या है। सरकारी नियम कहते हैं कि 20 पुरुषों या महिलाओं के लिए एक शौचालय होना चाहिए। लेकिन संजय कॉलोनी में महिलाओं के लिए एक भी शौचालय नहीं है। कुछ साल पहले एक शौचालय बना लेकिन वो भी बंद पड़ा है। हालांकि ऐसे इलाकों के लिए सरकार ने मोबाइल Toilet Van की सुविधा दी है, लेकिन उनकी हालत भी खस्ता है। शौच के लिए जंगल जाने के अलावा महिलाओं के पास कोई विकल्प नहीं।

इसके बाद शाहना पहुंची सावदा घेवरा। शहर से बाहर बसाई गई इस बस्ती को दिल्ली की मुख्यमंत्री पुनर्वास कॉलोनियों के लिए विकास का मॉडल मानती हैं। लेकिन यहां भी शौचालय को लेकर महिलाएं परेशान दिखीं। सावदा घेवरा में 40,000 की आबादी में एमसीडी ने केवल 9 सार्वजनिक शौचालय बनवाए। इनमें से केवल 4 इस्तेमाल के लायक हैं। बाकी या तो टूट चुके हैं या बंद पड़े हैं।

सभी Toilet Complexes में नहाने की सुविधा के लिए बाथरूम बनवाए गए लेकिन ज्यादातर में पानी का कनेक्शन ही नहीं है। हर बार शौचालय इस्तेमाल करने के लिए एक रुपया देना होता है। महिलाओं के पास कमाई का जरिया नहीं इसलिए अधिकतर महिलाएं जंगल में ही जाती हैं। महिलाएं खुले में नहा नहीं सकतीं इसलिए घर में टाट और बांस से बाथरूम बना लिए।

शाहना दिल्ली की 6 से ज्यादा स्लम और पुनर्वास कॉलोनियों में गईं। सभी जगह पाया कि शौचालय न होने की वजह से महिलाएं दिक्कत उठा रही हैं। दिल्ली के एक वकील अशोक अग्रवाल से शाहना को महिलाओं के साथ हो रहे इस भेदभाव के बारे में और जानकारी मिली। उन्होंने जाना कि दिल्ली मे बने 3192 सार्वजनिक शौचालयों में से केवल 132 महिलाओं के लिए हैं। करोलबाग, रोहिणी और सिविल लाइंस जैसे इलाकों में महिलाओं के लिए एक भी शौचालय नहीं है।

इन जानकारियों के आधार पर शाहना ने एक रिसर्च पेपर तैयार किया। ये रिसर्च सामने आई तो दिल्ली हाई कोर्ट में इस मामले पर एक Public Interest Litigation दायर की गई। हाई कोर्ट ने MCD को 4 हफ्तों में एक status report file करने के instructions दिए। इस बात को दो महीने से ज्यादा गुजर चुके हैं लेकिन इन इलाकों में कुछ भी नहीं बदला है।

पोस्टे बी Mritynjoy Thakur

जहाँ तक सवाल है झुगी बस्तियों का तो वहाँ के परिस्थितियो के ल वहाँ के लोग ही ज़िम्मेदार होते हैं.

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