मांझी को मिला किनारा, दादी बनी सहारा

TimeWed, Aug 20, 2008 at 14:23 , Updated at Wed, Aug 20, 2008 देश सेक्शन

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समाजसेवी संगठन मांझी को जापानी महिला के हवाले किए जाने का विरोध कर रही है।

समाजसेवी संगठन मांझी को जापानी महिला के हवाले किए जाने का विरोध कर रही है।

नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय ने बुधवार को 74 साल की जापानी महिला इमिको यामादो को उनकी 25 दिनों की पोती मांझी की परवरिश करने की अनुमति दे दी। मांझी का जन्म एक भारतीय महिला की किराए की कोख (सरोगेट मदर) से हुआ है।

न्यायाधीश अरिजित पसायत और न्यायाधीश एम. के. शर्मा की खंडपीठ ने इस मामले में समाजसेवी संगठन 'सत्या' से अपने दावे के पक्ष में तथ्य पेश करने को कहा।

मगर समाजसेवी संगठन कोई ठोस दलील नहीं दे सका। सत्या, मांझी को जापानी महिला के हवाले किए जाने का विरोध कर रही है। अपने दलील में सिर्फ इतना ही कह सकी कि मांझी एक लावारिश बच्ची है। लिहाजा मांझी को जापानी महिला के हवाले नहीं किया जाना चाहिए।

अदालत ने मामले की अगली सुनवाई की तारीख पर सोलिसिटर जनरल जी. ई. वाहनवटी से मांझी लेकर उठे सवालों पर भारत सरकार की स्थिति स्पष्ट करने को कहा।

अदालत ने सरकार से ये भी पूछा कि किराये के कोख संबंधी कानून की गैरमौजूदगी में बच्ची के माता-पिता कौन होंगे और उसकी नागरिकता कहां की होगी।

जन्म के तुरंत बाद बच्ची को अहमदाबाद स्थानांतरित कर दिया गया। लेकिन वहां हुए सिलसिलेवार बम धमाकों के बाद मांझी को जयपुर के अस्पताल में भर्ती कराया गया है, जहां उसकी दादी उसके साथ है।

मालूम हो कि 25 दिनों की एक मासूम बच्ची जिसके पास सबकुछ है लेकिन कुछ भी नहीं है। ये दर्द की एक ऐसी कहानी जिसमें एक कली फूल बनीं। लेकिन वो पल पल और तिल तिल मुरझा रही थी।

एक मासूम जिसके दूसरे बच्चों की तरह इसकी भी दो आंखें हैं। दूसरे बच्चों की तरह ये भी मां की कोख से पैदा हुई है। किसी भी दूसरे बच्चों की तरह इसे देखकर भी वही जज्बात मन में उभरते हैं।

लेकिन इन 25 दिनों में इसने दुनिया से 25 से भी ज्यादा सवाल पूछ लिए। पिछले महीने की 25 तारीख को धरती पर इसकी आंख खुली। लोगों ने इसका प्यार से मांझी नाम रखा।

मांझी की किस्मत भगवान ने नहीं आप और हमारे जैसे इंसानों ने लिखा। ये बच्ची उस इंसान की आवाज है जो अपनी मदहोशी में कुदरत के निजाम को चुनौती देता है।

लेकिन कुदरत को हर इंसान की सीमा का अहसास है। इस बच्ची की दर्द भरी दास्तान आज पूरा जमाना सुन रहा है। लेकिन इंसान की बेबसी देखिए कि कई बार वो दर्द में पड़े व्यक्ति की चाह कर भी मदद नहीं कर पाता।

अब इस कर्म की कहानी देखिए। इसकी शुरुआत होती है दस महीने पहले इस धरती से सात समंदर दूर जापान के टोक्यो नाम के एक शहर में। वहां एक बेऔलाद पति पत्नी है। पति एक अर्थोपेडिक सर्जन है। नाम है यू की यामदा। पति पत्नी को कोई औलाद नहीं है।

जज्बात जब जोर पकड़ता है तो इंसान की तड़प सांस रुकने वाली बेचैनी से भी बढ़कर होती है। यामदा दंपति के साथ भी ऐसा ही होता है। कुछ दोस्तों की मदद से वो भारत आते हैं।

गुजरात के शहर अहमदाबाद में किराए की कोख लेते हैं और ये मासूम गर्भ में आ जाती है। जापानी दंपति अपने वतन वापस चले जाते हैं। बच्ची गर्भ में बड़ी होती है।

जरा उस प्यार के बारे में सोचिए जो दो लोगों के बीच जब परवान चढ़ता है तो उसकी निशानी के लिए सात समंदर पार की दूरी भी नजर नहीं आती। और जब ये प्यार बिखरता है तो एक दूसरे की परछाईं भी नफरत की वजह बन जाती है।

इधर, बच्ची गर्भ में बडी़ हो रही है। उधर जापनी दंपति का प्यार घृणा की तस्वीर बन जाता है। दोनों अलग होते हैं। अपनी अपनी दुनिया में खो जाते हैं।

लेकिन उस दुनिया की वो निशानी वक्त के हिसाब से मां की कोख से धरती की गोद में उतर आती है। और उतरते ही किनारे की तलाश करती है। जैसे ही उसे नाम मिलता है 'मांझ’। उसके मुंह से शब्द फूटते हैं।

आमतौर पर आपने यही सुना है कि माता कभी कुमाता नहीं होती। लेकिन इस कहानी में माता की एक नई परिभाषा है। इस मासूम की जापानी मां जब अपने पति से अलग होती है तो उसे बच्ची की भी जरुरत नहीं है। उसे इसकी परवाह नहीं है।

इधर, जिस मां ने इस मासूम को नौ महीने तक कोख में रखा। वो भी इसे अपनाने को तैयार नहीं।पच्चिस दिनों में पच्चिस साल का वनवास झेल गई बच्ची। और कसूर सिर्फ इतना कि ये पैदा भगवान की मर्जी से नहीं हुई है। इसे इंसान की उस सोच ने पैदा किया है जो खुद को खुदा से भी बड़ा मान लेता है। आपका इस बच्ची से नाता नहीं है।

लेकिन ये दिल के रिश्ते की बात है। क्योंकि दिल स्वार्थ को नहीं मानता। स्वार्थ टूटा तो जापानी मां इसके पास नहीं रही।

स्वार्थ पूरा हो गया है तो भारतीय मां को इस मासूम की बेबसी समझ नहीं आई।

यहां सवाल उस करार का नहीं जो दस महीने पहले औलाद के लिए किया गया था। उस मसौदे में क्या गलत है क्या सही है..सवाल ये भी नहीं है।

सवाल ये है कि खुद को खुदा बताने वाला आज के इस इंसान ने किसी के शुक्राणु को किसी के बीजाणु से मिलाकर..किसी की गर्भ में डालकर बदनसीबी की जो ऐसी तस्वीर सामने ला रहा है। उस तस्वीर के बचपन में रंग कौन भरेगा?

लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद मांझी को आखिरकार किनारा मिल गया। उसे अब दूसरे बच्चों की तरह छत नसीब हो सकेगा।

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