15 परसेंट में बिक गए आचार्य प्रमोद
IBN7/ कोबरा पोस्ट
नई दिल्ली। संवाददाता - पंद्रह परसेंट में आपको कोई दिक्कत तो नहीं है न।
आचार्य प्रमोद - जितना हो जाए उतना अच्छा है। देखिए हमको पता है नहीं, क्या किया जाता है। आप ये सोचो कि ये ट्रस्ट आपका है। अगर आप पंद्रह परसेंट की जगह सोलह कर दो तो और अच्छा है। सत्रह दे दो तो और अच्छा। जितना मैक्सिमम फायदा ट्रस्ट को मिल सकता है आप दिला दो हमें। कोई गठरी बांध कर सिर पर थोड़ी ले जाना है।
ये रहस्य और रोमांच से भरी कोई फिल्म नहीं, असली जिंदगी की एक कड़वी सच्चाई है। मोह-माया त्यागने का प्रवचन देने वाले आचार्य प्रमोद का खेल है। लाखों भक्त आचार्य के एक-एक शब्द को जीवन का मूलमंत्र मानते हैं लेकिन खुद आचार्य का मूल मंत्र है लक्ष्मी - फिर भले ही वो काली हो या गोरी।
दरअसल हम बड़े कॉरपोरेट घरानों के एजेंट बनकर उनसे मिले थे। हमने कंपनी की चिंता हरने की गुजारिश की। कहा टैक्स बचाना है। कुछ करो गुरु जी- गुरु ने अपना पिटारा खोल दिया। हमने कहा कि पांच करोड़ ब्लैक मनी दान के तौर पर देंगे, गुरुजी पंद्रह परसेंट अपने पास रखकर बाकी व्हाइट के रूप में हमें लौटा दें। फिर क्या था आदर्श जीवन की सीख देने वाले आचार्य प्रमोद मोलभाव पर उतर पड़े।
आचार्य प्रमोद एक-एक कदम फूंक-फूंक कर रखते हैं, उन्हें यूं ही हमपर भरोसा नहीं हो गया। दरअसल, 20 सालों से उनकी परछाई बने हुए उनके मैनेजर कैप्टन संदीप को हमने शीशे में उतार लिया था। कैप्टन संदीप से हमारी मुलाकात दिल्ली के विश्व युवा केंद्र में हुई। संदीप ने किसी जासूस की तरह हमें परखा। ब्लैक मनी को व्हाइट करने में जोखिम जो है।
संदीप - बताइए मेरे को, है क्या चीज ये?
संवाददाता - कॉरपोरेट फंडिंग है। टैक्स बचाना है और उसमें कुछ परसेंट रिटर्न का होता है।
संदीप - कंपनी किस तरह की है।
संवाददाता – कॉरपोरेट है।
संदीप - किस तरह की कॉरपोरेट है।
संवाददाता - ये देखिए कॉन्फिडेंशियल होता है।
संदीप - कॉन्फिडेंशियल, मैं तुमसे अगर पैसे ले रहा हूं और मुझे पता नहीं तुम कौन हो। यार कल को दाऊद इब्राहिम मेरे एकाउंट में पैसे भिजवाता रहा हो।
संवाददाता – नहीं-नहीं। दाऊद इब्राहिम कैसे हो सकता है
संदीप - अरे उसकी कंसल्ट कंपनी है। We have to know the person, We have to know the company. अल्टिमेटली जो हम आपसे पैसा लेंगे हमें उसको जस्टिफाई भी तो करना होगा कि कहां यूज किया।
पैसे का ही जोर था जो कुछ ही मिनट की बातों में कैप्टन संदीप को हमपर भरोसा हो गया और उसने आचार्य प्रमोद से हमारी मुलाकात तय करवाई। उसी वक्त हमें पता चला कि बड़े-बड़े नेताओं और उद्योगपतियों को अपने चेले-चपाटे बनाने वाले आचार्य प्रमोद एक जमाने में कांग्रेस की उत्तर प्रदेश इकाई के जनरल सेक्रेटरी रह चुके हैं। राजनीति की नस पकड़ने के बाद ही वो धर्म भूमि पर उतरे। उन्होंने सार्थक और परमार्थ नाम से दो धार्मिक ट्रस्ट खड़े किए। यकीनन सार्थक रही ये कोशिश। परमार्थ की खासी चिंता है आचार्य को। खुद ही सुनिए - आचार्य जी हमसे बात करने से पहले अपने मैनेजर से हमारे बारे में पूछ रहे हैं। जोखिम ब़ड़ा जो है।
आचार्य प्रमोद - तुम्हारी इनसे बात हुई। ट्रस्ट का तो कोई इसमें झमेला नहीं पड़ेगा न।
आचार्य प्रमोद - बताइए राजीव जी क्या आदेश है।
संवाददाता - बस प्रमोद जी, मैंने उस दिन फोन किया था आपको। वो चीज बताई थी मैंने कॉरपोरेट फंडिंग वाली।
आचार्य प्रमोद - उनसे बात हो गई आपकी।
संवाददाता - संदीपजी से ? हम लोग उनसे मिल लिए थे। आपने जैसा कहा था कैप्टन संदीप।
आचार्य प्रमोद – हां-हां
संवाददाता - वो पूछ रहे थे कितना रिटर्न देना होगा। तो हमने दस परसेंट बोला था। दस परसेंट आप रखेंगे, नब्बे परसेंट हम वापस लेंगे।
आचार्य – हूं।
संवाददाता - तो उसमें उन्होंने ये बोला कि पंद्रह परसेंट हम रखेंगे और पचासी परसेंट आपको वापस कर देंगे। इस पर संदीप जी से बात हुई है।
आचार्य – हूं।
लालच भी है लेकिन ये चिंता भी कि कही कुछ गड़बड़ न हो जाए। मैनेजर तो दलाल का काम कर रहा है लेकिन जब आचार्य जी को खुद ही हमसे वादा करना है तो क्या करें। बचते-बचाते बोले। मुंह खुला तो कानून तोड़ने की डर भी निकला।
आचार्य प्रमोद - तो ये है कि कोई नाम खराब होने वाली बात न हो जाए। हमारा मतलब कोई दिक्कत न आ जाए हम लोगों पर। अब आप ये देख लेना हमने लिया नहीं है कभी। जब इतना पैसा वापस किया जाएगा तो कोई न कोई रास्ता तो निकालेंगे ही न आप।
आचार्य प्रमोद - देखिए पहले हम अपनी सेफ्टी चाहेंगे। कोई हमारे इल्जाम न आ जाए। इल्जाम आता है तो हमने पहले ही कह दिया। वो कह रहा है कि मैं भी इनकी मदद कर दूंगा। मतलब ये पॉसिबल है ? पॉसिबल है तो ठीक है।
आचार्य प्रमोद से हमारी डील पक्की हो चुकी थी। उन्होंने पांच करोड़ के काले धन को सफेद बनाने के लिए हामी भरी। इस काम के लिए उन्होंने बतौर एडवांस 31 सौ रुपये लिए।
दुनिया को धर्म के मार्ग पर चलने की शिक्षा देने वाले आचार्य प्रमोद इक्कीतस सौ रुपए में अपना असली चेहरा दिखा गए। पांच करोड़ के पंद्रह फीसदी के लालच में डूब गए। मोटी कमाई के लिए सरकार को करोड़ों का चूना लगाने के लिए तैयार हो गए। दुनिया के सामने एक धर्मगुरु बेनकाब हो गया था।


























