भगवान पर चढ़ाए फूलों से बना होली का रंग

TimeTue, Jun 16, 2009 at 17:56 , Updated at Tue, Jun 16, 2009 सिटिज़न जर्नलिस्ट सेक्शन

Tagsटैग: CJ,Madhu,Delhi | 0 कमेंट्स

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मधुमिता पुरी उन बच्चों के लिए काम करती हैं जो शारीरिक रूप से अक्षम है।

मधुमिता पुरी उन बच्चों के लिए काम करती हैं जो शारीरिक रूप से अक्षम है।

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नई दिल्ली। पर्यावरण को बचाने की हर छोटी कोशिश मायने रखती है क्योंकि हम जो भी उसका अच्छा या बुरा असर पर्यावरण पर पड़ता है। क्या आपने कभी सोचा है कि घरों-मंदिरों में भगवान पर चढ़ते फूल भी इस बर्बादी में शामिल हैं।

यमुना किनारे पड़े फूल लोगों की आस्था का प्रतीक हैं। यमुना किनारे दिल्ली में होती है फूलों की खेती। यमुना की बदकिस्मती देखिये जिन फूलों को सींच कर वो बेहद खूबसूरत और खुशबूदार बनाती है वही फूल इस नदी को बदसूरत करने उसके बर्बाद होने की वजह बनते हैं। लेकिन दिल्ली की मधुमिता पुरी ने फूलों से हो रहे इस प्रदूषण का एक हल ढूंढा।

मधुमिता पुरी उन बच्चों के लिए काम करती हैं जो शारीरिक रूप से अक्षम है। इनके संस्थान के सामने एक मंदिर है। वहां का पुजारी रोज मंदिर में चढ़ाए गए फूलों को नदी में प्रवाहित कर देता था। उस समय मधुमिता को लगा कि इतनी ज्यादा मात्रा में रोज फूलों का नदी में विसर्जित होना नदी के लिए कितना खतरनाक है।

मधुमिता ने सोचा क्यों ना इन फूलों का दोबारा इस्तेमाल किया जाए। और उन्होंने फैसला किया कि अगर इन फूलों से होली के रंग बनाए जाएं तो पर्यावरण को भी नुकसान नहीं होगा और फूलों का भी अच्छी तरह इस्तेमाल हो जाएगा और साथ ही शारीरिक रूप से असक्षम इन बच्चों को भी रोजगार का अवसर मिल जाएगा।

फूलों के लिए जब इन लोगों ने मंदिर के पुजारी से बात की तो वो नहीं माने आखिर आस्था का सवाल था। लेकिन बाद में काफी समझाने पर वो मंदिर में चढ़ाए फूलों को देने के लिए राजी हो गए। बच्चे रोज मंदिरों से फूल इकट्ठा करने जाते हैं। ताकि उनसे रंग बनाए जा सकें।

मधुमिता ने बच्चों को फूलों से रंग बनाने की ट्रेनिंग दी। फूलों से रंग बनाने के लिए इन्हें साल में करीब एक टन फूलों की जरूरत थी। इसके लिए इन लोगों ने अलग अलग टेंट हाउस और होटलों में बात की। आज दिल्ली के 12 फाइव स्टार होटल इन्हें फूल भेजते हैं। इन लोगों ने इस काम को केवल अपने तक ही सीमित नहीं रखा दिल्ली के तकरीबन 45 स्पेशल स्कूलों में मधुमिता ने इसकी ट्रेनिंग दी है। मधुमिता चाहती हैं कि उनके इस काम से पर्यावरण तो सुरक्षित हो ही साथ ही शारीरिक रुप से असक्षम इन बच्चों को रोजगार भी मिले। पिछले साल 1200 से 1500 लोगों ने इस काम के जरिए आमदनी की है।

दिल्ली में ही नहीं दिल्ली से बाहर भी मधुमिता ने लोगों को इसके लिए जागरूक किया कि फूलों को नदियों में न बहाकर उसका इस्तेमाल रंगों को बनाने में किया जाए।

वृंदावन में फूलों का पूजा में इस्तेमाल बहुत ज्यादा होता है इसलिए लोगों को नहीं समझ आता कि इस्तेमाल के बाद फूलों का क्या किया जाए। मधुमिता ने वहां जाकर फ्रेंड्स ऑफ वृंदावन नाम की संस्था को इस काम के बारे में बताया। अब वहां भी लोग फूलों का बखूबी इस्तेमाल कर रहे हैं।

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