जंगल बचाने के लिए शंकर भाई की मुहिम
Tue, Jun 16, 2009 at 17:54 , Updated at Fri, Jul 03, 2009 सिटिज़न जर्नलिस्ट सेक्शन
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भरूच। जिस तेजी से हम आबोहवा में कार्बन छोड़ रहे हैं उसने धरती पर असर दिखाना शुरू कर दिया है। ये मुद्दा अब धरती की बर्बादी से जुड़ गया है हमारी और आपकी जिंदगी से जुड़ गया है। भरूच के शंकर भाई ने हकीकत को पहचाना और अपने दम पर गुजरात के जंगल बचाने निकल पड़े।
सिटीज़न जर्नलिस्ट शंकर भाई और उनके गांव के लोगों ने मिलकर बताया कि किस तरह उन्होंने अपने जंगलों को बर्बादी से बचाया।
बालाराम और जेसोर बनासकांठा गुजरात के माने हुए अभ्यारण हैं। ये जंगल पशु-पक्षियों का बसेरा हैं और आसपास रहने वाले आदिवासियों की रोजमर्रा जिंदगी का हिस्सा। लेकिन कुछ साल पहले इन जंगलों में मानव गतिबिधियां बढ़ने लगीं। माफिया ने गैरकानूनी ऱुप से इन जंगलों के अंदर पेड़ों की कटाई और पत्थर का खनन शुरू कर दिया। पैसे का लालच देकर ये काम आदिवासियों से कराया जाता था।
जंगल में मौजूद प्राकृतिक संसाधनों का अवैध खनन इस कदर बढ़ गया कि कभी हरियाली से ढकी रहने वाली ये पहाड़ियां बंजर और वीरान हो गईं। पेड़ों की कटाई ने पशु-पक्षियों को भी बेघर कर दिया।
शंकर भाई ज्यादा पढ़े लिखे तो नहीं हैं लेकिन उन्हें पता है कि इस तरह हो रही पेड़ों की कटाई से प्रकृति के साथ साथ हमको भी कितना नुकसान है।
किसी ने भी जब इस बर्बादी को रोकने की पहल नहीं की तो किशन भाई ने अकेले ही कुछ करने का फैसला किया। समस्या के समाधान के लिए सबसे पहले जरुरत थी गांव के लोगों को समझाने की। बो लोग जो माफिया के हाथों की कठपुतली बन रहे थे।
बाहर से आए कॉन्ट्रेक्टर गांववालों को लालच देकर अवैध रुप से उनसे कटाई करवाते थे। शंकर भाई ने गांव-गांव जाकर लोगों को समझाया और अवैध रुप से हो रहे इस खनन को रोकने की अपील की। धीरे-धारे उनकी बातें लोगों को समझ आने लगीं।
लेकिन ये लोग अकेले माफिया से नहीं लड़ सकते थे। अभ्यारणय को बचाने के लिए प्रशासन की मदद जरूरी थी। किशन भाई ने अलग अलग विभागों में अधिकारियों को कई पत्र लिखे। कई विभागों के चक्कर भी काटे।
आखिरकार 4 साल बाद सोया प्रशासन जागा और जिला कलेक्टर ने इन गतिविधियों को रोकने के लिए एक आदेश जारी किया। प्रशासन के इस आदेश से गांववालों की हिम्मत बढ़ी है। जो लोग इन जंगलों और पहाड़ियों को काट रहे थे वो अब इनके पहरेदार हो गए हैं। लेकिन फिर भी जंगल पूरी तरह सुरक्षित नहीं।
लेकिन हमने हिम्मत नहीं हारी है। हम सदियों से इन जंगलों की रक्षा करते आए हैं और हमेशा करेंगे। आस-पास के गांव के लोग मिलकर यहां इक्कठा हुए। इन लोगों ने तय किया है कि रात के समय अलग-अलग टोलियां बनाकर ये जंगलों में गश्त लगाएंगे। मुहिम में पुरुष-महिलाएं और बच्चे सभी शामिल हैं।
किशन भाई को खुशी है कि उनकी इस पहल से प्रकृति के साथ हो रहे खिलावाड़ पर रोक लगी है। देश के कई हिस्सों में जंगल खतरे में हैं और वो चाहते हैं कि इस तरह की कोशिशों गांव-गांव में हो।
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