बंटी की कोशिश से सुधरी रेललाइन की समस्या
जम्मू। जम्मू के एक पहाड़ी इलाके के निवासी हर दिन लेट होती रेलगाड़ियों से परेशान थे। रेलवे लाइन सही जगह और सही ढंग से न बनी होने के कारण जम्मू से गुजरने वाली ट्रेनें घंटों फाटक पर रुकी रहती थीं ऐसे में कुछ नौजवानों ने मिलकर समस्या सुलझाने का बीड़ा उठाया और राष्ट्रीय स्तर की परियोजना की शुरुआत की।
बंटी जम्मू के कठुआ जिले का रहने वाले हैं। दिल्ली-पठान कोट से जम्मू आने वाली रेलगाड़ियां अक्सर कठुआ के पास आकर घंटों रुकती हैं। कठुआ में रहनेवालों को अगर आगे की गाड़ी पकड़नी हो तो वो समय से पहुंचकर गाड़ी नहीं पकड़ पाते। सिटीज़न जर्नलिस्ट के रूप में बंटी की कोशिश कठुआ में रहने वालों को इस परेशानी से निजात दिलाने की है।
जम्मू का कठुआ जिला पहाड़ियों से घिरा मैदानी इलाका है। इन्ही पहाड़ियों से होकर गुजरती हैं यहां आने वाली सभी रेलगाड़ियां। यही वजह है दिल्ली या अन्य राज्यों से आने वाली रेल गाड़ियां और माल गाड़ियां यहां घंटो फंसी रहती हैं। ये स्टेशन शहर से 9 किलोमीटर दूर है और स्टेशन तक पहुंचने में भी लोगों को बेहद परेशानी होती है। ये रेलवे ट्रैक अगर शहर के मैदानी इलाके से गुजरता तो रेलगाड़ियों के लिए रास्ता साफ होता।
सरकार ने इस परेशानी का हल मौजूदा ट्रैक को लंबा करके निकालना चाहा। लेकिन ये समस्या का समाधान नहीं था क्योंकि गाड़ियां लेट होने का असली कारण था मौजूदा ट्रैक।
साल 2002 में बंटी ने एक अखबार में पढ़ा कि रेल मंत्रालय कठुआ रेलवे-लाइन को लंबी करने की योजना बना रहा है। बंटी ने सोचा कि रेलवे लाइन को लंबा करने की बजाय अगर कठुआ शहर से दूसरा फाटक निकाला जाए तो इससे कई गांवों को फायदा होगा और लोगों को घंटो ट्रेन का इंतजार नहीं करना पड़ेगा।
परियोजना राष्ट्रीय स्तर की थी और शुरुआत में लोगों ने बंटी का मजाक उड़ाया। कहा कि वो एक नेशनल प्रोजेक्ट को रुकवाने जा रहे हैं और उनकी कोई नहीं सुनेगा। लेकिन इससे उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ा और वो इस काम में आगे बढ़ते रहे।
इस सबंध में बंटी ने रेल मंत्रालय से बात की। शुरुआत में तो रेल मंत्रालय ने उनकी बात पर गौर नहीं किया लेकिन बाद में उन्हें बंटी की योजना पसंद आई। उन्होंने उनकी योजना सराहना की साथ ही उन्हें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित भी किया और तथ्य और आकंड़े जुटाने में तकनीकी सहायता भी दी।
इस परियोजना को पूरा करने के लिए सबसे मुश्किल काम था लोगों को समझाना। 1950 में जब सरकार ने कठुआ रेलवे ट्रैक को शहर से गुजारने की कोशिश की थी तो हादसों के डर से लोगों ने इसका विरोध किया था। लेकिन इस बार लोगों को परियोजना समझ आई।
सभी तथ्य और आकंड़े जुटाने के बाद बंटी ने इस परियोजना पर काम करना शुरू किया और साथ ही वो अपनी पढ़ाई भी करते रहे। शोध करने से लेकर रिपोर्ट और नक्शा तैयार करने तक में बंटी को 5 साल का समय लगा। परियोजना में होने वाला सारा खर्चा उन्होंने खुद ही उठाया। धीरे-धीरे बंटी के काम से प्रभावित होकर लोग उनके साथ जुड़ने लगे। 2007 में इन लोगों ने नव कठुआ रेलवे स्टेशन निर्माण समिति की स्थापना की और योजना आगे बढ़ती गई।
आखिरकार 29 जुलाई 2008 में बंटी और उनके साथियों ने इस रिपोर्ट को रेल मंत्रालय को सौंपी और अगले ही दिन यानी 30 जुलाई 2008 को रेल मंत्रालय ने इसका तकनीकि निरीक्षण करवाया। जांच में सभी चीजें सही पाई गईं।
परियोजना को सफल बनाने के लिए लोगों के साथ-साथ प्रशासन और सरकार दोंनो का सहयोग जरूरी है। कठुआ से लेकर दिल्ली तक बंटी ने अधिकारियों और विधायकों से बात की।
रेल मंत्रालय की तरफ से इस योजना का बारिकी से निरिक्षण होना अभी बाकी है जिसका इन्हें इंतजार है। बंटी चाहते हैं कि जल्द से जल्द इस पर काम हो और लोगों को उनकी परेशानियों से छुटकारा मिले।
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