बुधवार, अक्टूबर 22, 2008 20:40s
पीजी नहीं प्रताड़ना...
जब मैं दिल्ली आई तो मेरे सामने एक बड़ी समस्या खड़ी थी रहने की। एक दोस्त के जरिए मुझे एक पीजी का पता चला। घरवालों से काफी डिस्कशन के बाद मैं उस पीजी को देखने गई साथ में मेरा भाई भी था।घर में घुसते ही मैंने एक मोटी सी आंटी को कुर्सी पर बैठे देखा। मैं समझ गई कि ये ही पीजी चलाती हैं। जब में अंदर जाकर बैठी तो मुझे उस घर में कुछ गंदगी महसूस हुई। बातचीत करने के बाद जब मैं बाहर आई तो मैंने तुरंत अपने भाई से कहा कि इस पीजी में कितनी गंदगी है लेकिन मेरे भाई ने मुझे ये बोलते हुए चुप करा दिया कि यहां पर अपने घर जैसा कुछ नहीं मिलेगा। इसके बाद मैं उस पीजी में शिफ्ट कर गई। शुरुआत में तो मैं काफी डरी-डरी सी रहती थी। धीरे-धीरे खुल गई और फिर पीजी का असली रूप भी मेरे...


























