शनिवार, अक्टूबर 25, 2008 16:37s
सबसे बड़े जादूगर
जादूगरी के खेल तो कई देखे हैं मगर पुलिस से बड़ा जादूगर शायद ही हो। जादूगरी ऐसी कि देखने वालों के होश उड़ जाएं। यकीन नहीं होता तो सुन लीजिए-1979 में दिल्ली की आबादी 40 लाख थी, इस साल दिल्ली के विभिन्न थानों में आईपीसी के कुल मुकदमे थे 44083 । करीब तीस साल बाद दिल्ली की आबादी है 1 करोड़ 67 लाख, इसके अलावा दिल्ली में हर दिन 20-30 लाख लोग आते-जाते हैं यानी करीब दो करोड़ लोगों की मौजूदगी के बाद दिल्ली के थानों में पिछले साल मुकदमे दर्ज हुए हैं 53244 । हुआ ना जादू! दिल्ली को क्राइम कैपिटल कहने वालों को तो अपने 'झूठ' पर सोचना चाहिए लेकिन कसूर इनका भी नहीं। भई दिल्ली में 1979 की बात करें तो क्राइम बढ़ाने वाले फैक्टर नहीं के बराबर थे। अब जब केवल आबादी ही नहीं बढ़ी, बढ़ गए हैं वो सारे फैक्टर जिसकी बिना पर...
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बुधवार, जुलाई 09, 2008 10:52s
दो नन्हे हाथ
ये डाबड़ी चौक था। लाल बत्ती हो चुकी थी लिहाजा मुझे गाड़ी रोकनी पड़ी। कुछ ही पल बीते थे कि दो हाथ कार के शीशे पर फैल गए। नन्हे हाथ कुछ मांग रहे थे, कुछ सोचता इसके पहले ही बत्ती हरी हो गई और मुझे वहां से चल देना पड़ा। मगर रास्ते भर वो दो नन्हे हाथ मेरी आंखों के आगे नाचते रहे। मीडिया में होने के बावजूद मेरे लिए यह खबर नहीं क्योंकि यह बिकेगी नहीं। खबर बेचने की परिपाटी जब से चल पड़ी है तब से ये खबरें नहीं की जातीं। बहरहाल मेरा मन और दिमाग दोनों में वो दो नन्हे हाथ छाए हुए थे और तब तक सागरपुर का चौक आ गया। वहां भी कई नन्हे बच्चे बच्चियों के हाथ कार के चालक सीसे पर फैले हुए थे कुछ लोग उन हाथों पर कुछ रख भी रहे थे। मेरी सोच जिंदगी के रफ्तार से कहीं तेज...
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मंगलवार, जून 10, 2008 12:45s
वेरिफिकेशन से क्या होगा?
नौकरों द्वारा किए जाने वाली वारदातों का सिलसिला जोरों पर है। साथ ही जोर पर है उनके वेरीफिकेशन करवाने की सीख देने का काम भी। मगर वेरीफकेशन एक मनोवैग्यानिक दबाव के सिवा कुछ नही। दरअसल वेरीफिकेशन फार्म भरने या पुलिस में उसे जमा करवा लेने भर से ही आपराधिक मानसिकता के नौकरों पर काबू नही पाया जा सकता। क्योंकि सही मायने में इन फार्म का पुलिस वैरीफिकेशन होता ही नहीं। दिल्ली में सिर्फ 2 या 3 फीसदी ही वेरीफिकेशन फार्म का जवाब आता है। बाकी सारे फार्म संबधित थानों में पेंडिंग पड़े रहते हैं। दरअसल इसकी प्रक्रिया ही ऐसी है। वैरीफिकेशन फार्म में भरे हुए पत्ते के थाने से पुलिस संबंधित नौकर के बारे में जानकारी मांगती है। मगर बिहार, पंजाब, यूपी या नेपाल भी जवाब देने की जरूरत नही समझता। फिर अगर जिस आदमी के बारे में जानकारी ली जा रही है...
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शनिवार, जून 07, 2008 15:19s
जांच कब होगी?
आरुषि-हेमराज हत्याकांड की जांच अब तक इतनी उलझ चुकी है कि उसके तह तक पहुंचना शायद ही संभव हो। होगा भी तो तब जब फारेंसिक जांच की रिपोर्ट आ जाए। खैर, इस पूरे हत्याकांड में शुरू से तफ्तीश हुई ही नहीं। अगर तफ्तीश हुई होती तो एक सबूत तो जरूर होता। जांच एजेसी के लिए सबसे बड़ी बिडंबना यही है कि सबूत के नाम पर कुछ नहीं। हो भी कैसे रूरल बैकग्रांउड के अफसरों को अचानक अरबन वैल्यू के मामले की तफ्तीश दी जाएगी तो यही होगा। इस केस में पुलिस ने तो मानो क्राइम का इंवेस्टिगेशन करने की जगह आरुषि के पूरे परिवार के चरित्र का इंवेस्टिगेशन किया था। तभी तो आई जी स्तर के अधिकारी सरेआम 14 साल की नाबालिग आरुषि से लेकर 40 पार कर चुकी महिला डॉक्टर अनिता तक के कैरेक्टर को गंदा करार दे दिया। बिना ये सोचे समझे...
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