सोमवार, नवंबर 10, 2008 07:06s
अरे बेताल! उड़ता कहां है...रुक..
दिनभर खबरों से जूझते-जूझते रात में भी उन्हीं के सपने आते हैं... क्या करूं समझ नहीं आता। हाल ही में मुझे एक सपना आया। मैं एक नई दुनिया में था। मेरे आसपास वीरानी छाई हुई थी। मैं परेशान कहां आ गया। खबरों की चिल्ल पों से दूसरी ये सूनामी सन्नाटा परेशान करने वाला था। आस पास सूखे पेड़ नजर आ रहे हैं। ऐसे एक पेड़ के करीब से गुजरते वक्त मुझे ऐक मरियल सा आदमी धोती लपेटे पेड़ पर उल्टा लटका नजर आया। मैं सकते में था कि कहीं यह बाबा कोई उल्टा लटक योग तो नहीं कर रहे। मैंने पास जाकर पूछा - बड़े मियां ये कौन सा योग कर रहे हैं। अचानक उन्होंने मेरी तरफ गुस्से से देखा फिर पैंतरा बदलते हुए मुस्कुराने लगे। बोले अरे निखट्टू मैं तुम्हारा ही इंतजार कर था। चलो चलो मुझे जल्दी पेड़ से नीचे उतारो। टाइम खोटी मत करो वरना में...
रविवार, अगस्त 17, 2008 10:43s
शबाना तुम भी…
अभी मैंने शबाना आजमी और सैफ के कमेंट पढ़े। फिर से मन में दबे एक सवाल ने कोहराम मचाना शुरू कर दिया है कि ये मुसलमान हैं तो क्या हुआ? आखिर यह अस्वीकार्यता क्यों हैं। आखिर क्यों दूसरे समाज में एक अकेले मुस्लिम परिवार के लिए जगह नहीं है। मैं भी बाकियों की तरह चुप्पी साध सकता हूं। चुपचाप मन में मचे इस कोलाहल को गुजर जाने दे सकता हूं लेकिन अब मैं ऐसा करूंगा नहीं। सच को स्वीकारना और उसका मुकाबला करना जरूरी है। यहां मेरा आक्रोश किसी दूसरे समुदाय को लेकर नहीं है। जाहिर है कि एक आम मुसलमान की इमेज बाकी समुदाय में स्वीकार्य नहीं है। इसके लिए मेरी नजर में खुद मुसलमान तबका ही जिम्मेदार है। ऐसा नहीं है मुस्लिम तबके में विकास नहीं हो रहा लेकिन ये जरूर हो रहा है कि जो आगे बढ़ रहा है वह बाकियों को तुच्छ मानकर भूलता...
पोस्टेड अफसर अहमद at 10:43 PM 15 कमेंट्स
मंगलवार, मई 27, 2008 13:56s
मेरी मर्जी
कुछ दिन पहले दिल्ली के एक व्यस्त बाजार से निकलते वक्त एक शख्स ने मुझे रोककर पूछा, टाइम क्या हुआ है भाई? मैंने जवाब दिया- फोर थर्टीफाइव। अब आप सोच रहे होंगे मियां, इसमें अजीब क्या है, बेशक मैं भी ऐसा ही सोचता हूं। लेकिन कुछ लोगों को इसमें इस्तेमाल की गई भाषा को लेकर ऐतराज हो सकता है। दरअसल इसमें अंग्रेजी वर्ड्स का इस्तेमाल हुआ है जैसे कि टाइम। काम के दौरान अमूमन हमें ऐसे यक्ष प्रश्न का सामना करना पड़ता है कि हम क्या लिखें। शुद्ध हिंदी या फिर वह भाषा जो आम जनमानस बोलता और समझता है। मीडिया कोई स्कूल की क्लास नहीं है यह तो आपको आपकी भाषा में जरूरी खबरें पहुंचाने का मजेदार माध्यम है। कहने की जरूरत नहीं जबतक हिंदी चैनलों का आगमन नहीं हुआ था तबतक सबकुछ ऐसा ही था पर अब प्रिंट और ऑनलाइन ने देर से ही सही...


























