विक्रांत यादव
स्पेशल कोरस्पोंडेंट
प्रीविअस पोस्ट
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शुक्रवार, जनवरी 15, 2010 18:14s
‘मॉई लॉर्ड यू ऑर नॉट सेकरोसेंट’
दिल्ली हाई कोर्ट के एक फैसले ने अब तक आम लोगों की निगाहों में खुदा के बराबर मानी जाने वाली न्यायपालिका को उन्हीं के दायरे में लाकर खड़ा कर दिया है। हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सूचना के अधिकार का कानून देश की सभी पब्लिक अथॉरिटीज पर लागू है और देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट भी पब्लिक अथॉरिटी है क्योंकि वो भी संविधान के तहत ही बनी है। कोर्ट ने आरटीआई कानून के बारे में कहा कि निस्संदेह ये भारतीय लोकतंत्र की सबसे महत्वपूर्ण घटना है। इस फैसले ने निश्चित तौर पर न्यायपालिका का कद आम लोगों की निगाह में एकाएक बढ़ा दिया क्योंकि अगर ये फैसला विधायिका करती तो इसकी इतनी महत्ता नहीं होती, लेकिन ये फैसला खुद अपनी सर्वोच्च सत्ता के खिलाफ देश के एक हाई कोर्ट का फैसला था।
इस मामले में सबसे पहले आरटीआई के तहत सुप्रीम कोर्ट से जानकारी मांगने वाले आम आदमी सुभाष चंद्र अग्रवाल ने तत्काल टिप्पणी की कि 'हाई कोर्ट के फैसले से साफ है कि इस देश में सुप्रीम सिर्फ आम आदमी ही है।' लेकिन तभी सुप्रीम कोर्ट के वकील ने कहा कि वो इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील करेंगे, जो देश की सर्वोच्च अदालत है। कई सालों से कोर्ट कवर करने के कारण अचानक मन में एक ख्याल आया कि न्यायिक व्यवस्था का प्राथमिक सिद्धांत है कि जज अपने से जुड़े मामले की सुनवाई नहीं कर सकते। तो क्या अब देश की सर्वोच्च अदालत इस प्राथमिक सिद्धांत को तोड़ेगी। क्योंकि इस मामले में वो सीधे तौर पर जुड़ी हुई है। इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें इस विवाद के इतिहास में जाना होगा।
आज से करीब सवा दो साल पहले 11 नवंबर 2007 को जब आम आदमी सुभाष मल्होत्रा ने सुप्रीम कोर्ट से जानकारी मांगी थी कि क्या देश के अलग-अलग हाई कोर्ट के जज और सुप्रीम कोर्ट के जज अपनी संपत्ति का ब्योरा चीफ जस्टिस को देते हैं। उन्हें ये जानकारी नहीं दी गई, जब विवाद ज्यादा बढ़ा तो कहा गया कि साथी जज चीफ जस्टिस को ये जानकारी आपसी विश्वास में देते हैं और इसके बारे में जानकारी नहीं दी जा सकती। ऐसे में बड़ा सवाल तो यही उठता है कि इस आम आदमी ने तो सिर्फ ये पूछने की हिमाकत की थी कि क्या जज अपनी संपत्ति का ब्योरा देते हैं या नहीं, उसने जजों की संपत्ति का ब्योरा तो नहीं मांगा था। ऐसे में मुझे याद आता है कि आरटीआई एक्ट के प्रिएंबल में लिखे वो शब्द जिनका अर्थ था- 'लोकतंत्र की जरूरत है कि उसके नागरिक जागरूक रहें और जानकारी की पारदर्शिता बनी रहे, जो लोकतंत्र को चलाने के लिए जरूरी है। इससे ना केवल भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी, बल्कि सरकार और उसके बाकी अंग आम जनता के प्रति जवाबदेह रहेंगे।'
मैं माफी मांगते हुए देश के मॉय लॉर्ड्स से जानना चाहूंगा कि क्या वो ऐसा नहीं चाहते। आखिर अगर जजों की संपत्ति सार्वजनिक हो जाएगी या फिर जजों की नियुक्ति के पैमाने सार्वजनिक हो जाएंगे तो इससे न्यायपालिका की आजादी कैसे भंग हो जाएगी। ये भी विडंबना ही है कि साल 2003 में चुनाव लड़ने वाले हर उम्मीदवार के लिए उसकी संपत्ति, आपराधिक मामलों का इतिहास, शैक्षिक योग्यता का ब्योरा देना जरूरी करने वाली सुप्रीम कोर्ट न्यायपालिका की आजादी के नाम पर आरटीआई कानून का विरोध कर रही है।
मुझे समझ में नहीं आता कि अगर आम आदमी को जजों की संपत्ति के बारे में पता लग जाएगा, उनकी नियुक्ति की प्रक्रिया के बारे में पता लग जाएगा, उनके खिलाफ आने वाली शिकायतों और उन पर उठाए गए कदमों के बारे में पता लग जाएगा तो न्यायपालिका की आजादी पर रोक कैसे लग जाएगी। क्या इससे ज्यादा पारदर्शिता नहीं आएगी। गांव की पंचायत हो या देश की सुप्रीम कोर्ट। हमारे समाज में न्यायिक अधिकारी को, चाहे वो दूर दराज के छोटे से गांव की पंचायत में बैठा पंच हो या फिर सुप्रीम कोर्ट का प्रधान न्यायाधीश, उसे परमेश्वर का दर्जा दिया जाता रहा है। लेकिन पिछले एक सवा साल से जिस तरह से न्यायपालिका पर उंगली उठनी शुरू हो गई है, वो न्यायिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है।
आखिर में मुझे देश के पूर्व चीफ जस्टिस जे.एस. वर्मा के एक व्याख्यान में दिए शब्द याद आते हैं- 'हम ये नहीं कह सकते कि हम ही सबको नियंत्रित करेंगे और क्योंकि हमने जज के पद की शपथ ली है, लिहाजा हमें किसी के नियंत्रण की जरूरत नहीं है। आंखे बंद कर लेना और ये कहना कि ऐसा कोई है जो किसी के प्रति जवाबदेह नहीं है, पूरी तरह से गलत होगा। ये हमारे संविधान की भावना नहीं है। ये समय की जरूरत है कि हम खुद अपने लिए उपयुक्त न्यायिक जवाबदेही सुनिश्चित करें।'
पोस्टेड विक्रांत यादव at 18:14s 1 कमेंट्स
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पोस्टेड बी brij duggal
बहुत बढ़िया लिखा है....सचमुच सूचना के अधिकार के दायरे में सबको होना ही चाहिए . ...
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