बुधवार, अक्टूबर 22, 2008 20:40s
पीजी नहीं प्रताड़ना...
जब मैं दिल्ली आई तो मेरे सामने एक बड़ी समस्या खड़ी थी रहने की। एक दोस्त के जरिए मुझे एक पीजी का पता चला। घरवालों से काफी डिस्कशन के बाद मैं उस पीजी को देखने गई साथ में मेरा भाई भी था।घर में घुसते ही मैंने एक मोटी सी आंटी को कुर्सी पर बैठे देखा। मैं समझ गई कि ये ही पीजी चलाती हैं। जब में अंदर जाकर बैठी तो मुझे उस घर में कुछ गंदगी महसूस हुई। बातचीत करने के बाद जब मैं बाहर आई तो मैंने तुरंत अपने भाई से कहा कि इस पीजी में कितनी गंदगी है लेकिन मेरे भाई ने मुझे ये बोलते हुए चुप करा दिया कि यहां पर अपने घर जैसा कुछ नहीं मिलेगा।
इसके बाद मैं उस पीजी में शिफ्ट कर गई। शुरुआत में तो मैं काफी डरी-डरी सी रहती थी। धीरे-धीरे खुल गई और फिर पीजी का असली रूप भी मेरे सामने आने लगा। तब मुझे ये अहसास हुआ कि बाहर रहना कितना मुश्किल होता है। जी, हां मैं बात कर रही हूं 'पीजी' की। पीजी यानी पेइंग गेस्ट, जहां आप पैसे देकर रहते और खाते हैं लेकिन क्या आपको मालूम है इन पेइंग गेस्ट की असली हकीकत?
बड़े-बड़े शहरों में पेइंग गेस्ट का चलन तो बहुत दिनों से है लेकिन इनदिनों इसने एक विकराल रूप धारण कर लिया है। खासकर हमारी राजधानी दिल्ली में चलने वाले पीजी जिसके शिकार होते हैं वे मासूम जो हजारों ख्वाहिश लेकर आते हैं लेकिन पीजी की मार के चलते कुछ उन सपनों को साकार करने में बहुत मुश्किलें भी झेलते हैं।
हर साल हजारों की तादाद में बच्चे दूर-दराज से अपना घर छोड़कर यहां पढ़ने-लिखने और जॉब करने के लिए आते हैं। लेकिन यहां आने के बाद उनकी दिक्कतें किस तरह और बढ़ जाती हैं इसका शायद आप अंदाजा भी नहीं लगा सकते।
अगर बात करें सिर्फ लड़कियों की तो उन्हें खासकर इन परेशानियों से दो-चार होना पड़ता है। दरअसल लड़कियों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए सभी मां-बाप चाहते हैं कि वे किसी की गाइडेंस में रहें तो ज्यादा बेहतर होगा। 21वीं सदी में भी लड़के और लड़कियों के बीच फर्क कम नहीं हो पाया है। इसी वजह से ज्यादातर लड़कियां फ्लैट लेकर रहने के बजाय पीजी में रहने को मजबूर हैं।
लेकिन इन पीजीस का हाल तो बद से बदतर होता है। खाने से लेकर हर चीज के लिए आप मुंहमांगी कीमत देते हैं लेकिन इसके बावजूद आपको उनकी प्रताड़ना झेलनी ही पड़ती है। हजारों रुपए देने के बाद भी आपको जो सुविधा मिलनी चाहिए वो नहीं मिलती और इस पर अगर आपने विरोध जताया तो फिर आपको कहीं और का रस्ता दिखा दिया जाता है।
पीजी में रहने का मतलब आप अपने लैंडलॉर्ड के मुताबिक रहिए। उनके हिसाब से जागिए, उनके हिसाब से सोइए, उन्हीं के हिसाब से खाइए और तो और उनके हिसाब से हंसिए भी। यानी अगर आप खुलकर हंसना चाहें तो उस पर भी पाबंदी है।
इन पाबंदियों की भी एक रोचक कहानी है। दरअसल देखा जाए तो अमूमन ये पीजीस अच्छे लोकैलिटी या फिर सोसाइटीज में ही होती हैं। अब आपको अगर सोसाइटी में रहना है तो उसके कुछ नियमों का भी पालन करना होता है। जैसे आप अपने घरों में कोई भी कमर्शियल काम नहीं कर सकते जिसका सबसे ज्वलंत उदाहरण है पीजी चलाने का काम। इसके अलावा आप ज्यादा शोर-शराबा भी नहीं कर सकते।
सोसाइटी में अंदर घुसने के लिए पहले आपको गेट पर ही एंट्री करनी होती है। तो अगर आप इन सभी नियमों को पालन सही ढंग से कर रहे हैं तो आप सेफ हैं वरना आपका सोसाइटी में रहना खतरे से खाली नहीं। सोसाइटी मेंबर्स किसी भी वक्त आपके घर धावा बोल सकते हैं और अगर आप पकड़े गए तो इसका भुगतान आपके लिए काफी महंगा पड़ सकता है। तो पीजी में सख्ती बरतने के पीछे काफी हद तक ये सभी कारण भी जिम्मेदार हैं।
इसके अलावा कुछ हद तक महंगाई भी इसके लिए जिम्मेदार है लेकिन महंगाई की सारी मार बेचारे बच्चों पर ही क्यों? क्यों ये मासूम दूसरे शहर में अपने मन मुताबिक जिंदगी नहीं जी सकते। आखिर क्यों इन्हें पैसे देने के बाद भी वो फ्रीडम नहीं मिलती जो इन्हें मिलनी चाहिए। इसका जवाब काफी मुश्किल है।
अगर आप भी अपने बच्चों को बाहर भेजने की सोच रहे हैं तो सबसे पहले उसके रहने की उचित व्यवस्था जरूर कर लें वरना आपका बच्चा भी शायद इन्हीं में से किसी एक पीजी की प्रताड़ना का शिकार हो सकता है।
टोटल कमेंट्स
पोस्टेड बी sachin
ई डोन'ट उँदेरस्थांद व्हत दो उवँ वंत तो सय? पलेआसे प्रेसिसे मदम. हूँको नही लगता की सभी पग'स एक जैसे होते है. अक्तुअल्लय आप अपना ग़ुस्सा निकाल रही हो ...
पोस्टेड बी sanjay gupta
देआर पूजा मई आपकी बातो से सहमत हूँ ब्ट आप येह भी तो देखो की घर जैसा आराम अगर बाहर मिल जाए तो फिर अनतेर ही क्या रह जाएगा ...





























पोस्टेड बी Satya Narayan
हमारा समाज पैसो का इतना भूखा हो गया है की इंसानियत तुच्छ हो गई है. संत माहातमाओं के उपदेश व्यर्थ लगते हैं. अपनी मेहनत सेअपना पराप्य प्राप्त करे, अँव ख़ुद के प्रति ईमानदर रहें चरित्र और नक़ाब पहने लोगों से उम्मीद न करें. ...
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