मनीष कुमार

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मनीष कुमार

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बुधवार, अक्टूबर 22, 2008 19:26s

राहत के नाम पर लूट

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लिस्ट में नाम देबे लेल पैसा देबे पड़त.....। यानी अगर बाढ़ पीड़ित की लिस्ट में आप अपना नाम चाहते हैं तो आपको पैसे देने होंगे। दरअसल बिहार में बाढ़ राहत के नाम पर लूट मची हुई है। बाढ़ से तबाह हुए लाखों लोगों तक ठीक तरीके से राहत तो नहीं पहुंच रही है लेकिन राहत पहुंचाने के नाम पर नेता से लेकर सरकारी अधिकारी जमकर अपनी जेबें भर रहे हैं। मैंने कई राहत केन्द्रों का दौरा किया, हर जगह राहत में जमकर धांधली की जा रही है।

राहत पैकेज के तौर पर राज्य सरकार अगले तीन महीने तक लोगों को अनाज और पैसे दे रही है। इसके तहत पहले महीने की राहत की तौर पर 2250 रुपये और एक क्विंटल अनाज दिया जा रहा है। लोगों को नकद रुपये पूरे तो दिए जा रहे हैं। लेकिन पूरा एक क्विंटल अनाज नहीं मिल रहा है। करीब चार से पांच किलो गेंहू और चावल हर बोरी में कम है। लोग इसके खिलाफ अवाज तो उठा रहे हैं लेकिन इनकी सुनने वाला कोई नहीं है।

सुपौल जिले के बलुआ बाजार में रहने वाले रुपक ठाकुर को राहत लेने के लिए करीब बीस घंटे का सफर तय करना पड़ा। उन्होंने कहा - बाढ़ के कारण हमारा गांव पूरी तरह बर्बाद हो गया है। पूरे इलाके का सम्पर्क टूटने के कारण एक घंटे के इस सफर में मुझे 20 घंटे लगे। यहां तक पहुंचने में 300 रुपये भी खर्च हुए लेकिन ये देखकर बड़ा झटका लगा कि सरकार सिर्फ एक क्विंटल अनाज दे रही है। इसमें से भी करीब 10-15 किलो अनाज गायब है। आखिर हम गरीब अपना पेट कैसे भरें।

राहत केन्द्रों पर शिकायत करने वालों की लाइन लगी हुई है। कुछ लोगों की बोरी से अनाज तो कम कंकड़, पत्थर और मिट्टी ज्यादा निकल रहे हैं। इतना ही नहीं राहत केन्द्रों के ठीक बगल में व्यापारी भी खुलेआम अपना धंधा चला रहे हैं। लोगों को अनाज की बोरियां मिलते ही ये उन्हें खरीदने के लिए ये लोग टूट पड़ते हैं। ये हालत है बिहार के सबसे ज्यादा बाढ़ पीड़ित इलाकों की।

बाढ से प्रभावित जिले हैं... सुपौल, सहरसा, मधेपुरा, अररिया, पूर्णिया...। इन जिलों के लगभग हर इलाके को सरकार ने बाढ़ प्रभावित घोषित किया है। सुपौल, सहरसा और मधेपुरा पूरी तरह पानी में डूब चुका है लेकिन अररिया और पुर्णिया जिले के कई इलाके काफी कम तबाह हुए हैं। ऐसे में इन इलाकों में राहत की जमकर लूट मची हुई है।

दरअसल यहां के लोग ये सोच रहे हैं कि राहत के नाम पर उन्हें जो कुछ भी मिलेगा वो उनके लिए बोनस होगा। ऐसे में इन इलाकों के मुखिया और सरकारी अधिकारी जम कर पैसा ऐंठने में लगे हैं। यहां तक की राहत की लिस्ट में नाम देने के लिए पांच-पांच सौ रुपये लिए जा रहे हैं। कई जगह तो पैसा कमाने के चक्कर में राहत सामग्री को कई दिनों तक गोदाम में रखा जा रहा है। हंगामे और धरने प्रदर्शन भी हुए लेकिन अधिकारी जेब गर्म करने के चक्कर में लगे रहे हैं।

अब जरा स्कूलों का हाल भी जान लिजिए बाढ पिड़ित इलाकों में लगभग सारे स्कूल बंद हैं। लाखों बच्चों का भविष्य दांव पर है। राहत शिविर में रह रहे बच्चों के पढाई-लिखाई के लिए सरकार ने इंतजाम तो किए हैं लेकिन इन स्कूलों में पहले से पढ़ रहे बच्चे घर पर वक्त बिता रहे हैं। अररिया जिले के सत्यनारायण मलिक कहते हैं - मेरे पास पैसे नहीं हैं कि बच्चे को ट्यूशन पढ़ाएं। पता नहीं वो कब स्कूल जाएगा।

सरकार ने वैसे तो स्कूलों को खाली करा कर बाढ़ पिड़ित लोगों को मेगा शिविर में भेजने का फैसला किया है लेकिन अभी तक सारे फैसले कागज पर ही हैं। कैम्प में रह रहे लोगों के आंसू अब सूख गए हैं लेकिन आप अगर वहां जाएंगे तो आपकी आंखें भर आएंगी। लोग अपना दुख बांटकर हल्का महसूस करते हैं। बार-बार मन में एक ही सवाल उठता है कि आखिर कबतक इन्हें यूं ही जिंदगी से जूझना पड़ेगा।

पोस्टेड मनीष कुमार at 19:26s     9 कमेंट्स

टोटल कमेंट्स

पोस्टेड बी NITIN GUPTA

मेरा भारत महान 100 में से 99 बाइइमान ये पंक्ति हमारे देश के स्यस्टें में बिल्कुल सही फ़िट होती है शायद जब हमारे देश में कोई प्राकृतिक आपदा आती है तो हमारे नेता ओर अफ़सर फ़ुले नही समाते क्योंकि तब सिलसिला शुरू होता है पूरे देश ओर विश्वा से मदद का आना ओर वो भी पैसो के रूप में खाने के रूप में लेकिन वो सब आता है उनके लिए जो इन आपदाओ का शिकार हुए है लेकिन उन तक तो ये सब मदद पहुँचती ही नही है उन्हे तो अपने समान लेने के लिए ख़ुद पैसे देने पड़ते है उसके बाद भी गरीमत है के उन्हे मदद मिल जाए. जैसा की मनीष सर ने कहा में उनसे सो फ़ीसदी सेहमआत हू पर हम सुधार नही सकते आज़ादी से पेहले हमे अँग्रेज़ो ने लूटा ओर अब अपने ही नेता ओर अफ़सर अँग्रेज़ो के रह पर चल रहे है आम आदमी तो 60 साल पेहले भी ग़ुलाम था ओर आज भी है ( नितिन गुप्ता, स्टूडेंट ओफ़ ज़ौरनलिस्म, एल, पी, यू) ...

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पोस्टेड बी amit kuamar

आपने बिल्कुल सही कहा मनीष जी, जो आपने लिखा है वो शत प्रतिशत सही है सारी जानकारी पड़ने के बाद ऐसा लगता है की जीतने भी अधिकारी हैं उनके खिलाफ़ करवाही करना छाई ...

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पोस्टेड बी वसीम अब्बासी

मनीष जी जो आपने लिखा वो सही है... क्योंकि जब कोसी मय्या ने बिहारवासियों पर कहर ढाया था तो उस वक्त भारत के प्रधानमंत्री प्रिय मनमोहन जी ने 1000 करोड़ रुपये राहत कोष के लिए दिए थे। ये इतनी बड़ी रकम है जिससे 1000 शख्स अमीर तब्के में शूमार हो सकते हैं..जिससे पूरे बिहार के लिए साल भर के अनाज का इंतज़ाम किया जा सकता है.. जिससे लाखों लोगों को छत नसीब हो सकती है.. लेकिन अभी तक बिहार के लोग बाढ़ के कहर से उभर नहीं पाये हैं ऐसे में ऐसे राहत के नाम पर लूट ही कहा जा सकता है ...

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पोस्टेड बी kumarvimalwa

मनीष जी की लेखनी में दम है.. बिहार में बाढ़ के नाम पर लूट का धंधा सही चल रहा है.. मनीष जी कृप्या करके न्यज़ चैनल में भी ऐसी ख़हरें चलवायें... ...

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पोस्टेड बी मनीष पंत

बिहार में बाढ़ की जब पहली खबर आई तो ये पता चला कि आज़ादी के 61 सालों के बाद भी भारत में कई जगह मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। बाढ़ से जनजीवन अस्त व्यस्त हो चुका था और अब जब ये पता चला कि राहत के नाम पर अधिकारियों ने लूट मचा रखी है तो मैं काफी हैरान हुआ, ऐसी ही कुछ खबरें जब सुनामी आई थी तब भी हुई थीं कि प्रभावित लोगों के साथ लूटपाट हुई थी। कम से कम इस बात को तो ध्यान में रखना चाहिए कि ऐसा हमारे साथ भी हो सकता है, लेकिन इस बात की चिंता हमें कहां, हमें तो बस अपनी जेबें गरम करने से मतलब है चाहे किसी का घर उजड़े या फिर किसी को मौत भी आ जाए। खैर आपको बस यही बोलना चाहुंगा कि बहुत अच्छे दोस्त, तुम्हारे इस लेख से शायद ही सही लेकिन कुछ तो बदलाव की उम्मीद है। ...

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