मंगलवार, अक्टूबर 14, 2008 13:30s

क्रिक्रेट धर्म और बाजार के शिकार सौरव

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फैबुलस फोर के सदस्य सौरव गागुंली मौजूदा भारत-ऑस्ट्रेलिया सीरीज के बाद अंतरराष्ट्रीय क्रिक्रेट को अलविदा कह देंगे। इस ऐलान से भारतीय क्रिक्रेट के एक आक्रामक खिलाड़ी के एक अध्याय का अंत हो गया। लगा कि सब कुछ सामान्य ही है। एक खिलाड़ी के खेल कैरियर का अंत तो होता ही है। लेकिन इस ऐलान का असली खेल तो तब सामने आया जब सौरभ ने एक अखबार को दिए साक्षात्कार में आरोपों की झड़ी लगा दी। इसके बाद तो भारतीय क्रिक्रेट में मानो तूफान आ गया हो- एक बात जो सामने आई वो ये कि क्रिक्रेट को अलविदा कहने का कारण उम्र नहीं है- बल्कि उसके कई खलनायक भी हैं।

दादा के कैरियर पर नजर दौड़एं तो हमें एक शानदार आंकड़ा दिखता है। बंगाल टाइगर ने 109 टेस्ट मैच की 180 पारियों में 15 बार नाबाद रहते हुए 6888 रन बनाए हैं। टेस्ट मैच में गांगुली के 41.74 औसत से 15 शतक और 34 अर्धशतक है। जबकि उन्होंने 311 वनडे की 300 पारियों में 23 बार नाबाद रहते हुए 22 शतक और 72 पचासों की मदद से 11363 रन बनाए हैं।

दादा ने एक बांग्ला अखबार में खुलासा करते हुए कहा कि लागातार हो रहे अपमान से मैं थक गया था, मैं किसी के रहमों करम पर नहीं खेलना चाहता-बस बहुत हुआ, मैंने सिर्फ एक ही सीरीज में खराब प्रदर्शन किया है, लेकिन फिर भी मैं ही निशाने पर हूं। दादा ने ये रहस्योघटन करते हुए एक तीर से कई निशाने लगाए हैं। ये तीर लगा है वेंगसरकर, धोनी, युवराज और गुरू ग्रेग चैपल को। गांगुली का इंटरव्यू करने वाले पत्रकार सौरांशु देवनाथ का भी मानना है कि गांगुली ने संन्यास की घोषणा की है।

दरअसल आज क्रिक्रेट ने अपनी वैल्यू काफी बढ़ा ली है। अगर इसके दो करण ढूढ़े जाएं तो पहला नाम कपिल देव का आता है और दूसरा जगमोहन डालमिया का। इन दोनों ने तो जैसे भारतीय क्रिक्रेट की तस्वीर ही बदल कर रख दी। कपिल की कप्तानी में जब 1983 में भारत ने विश्व कप जीता तो भारत में क्रिक्रेट भद्रजनों का खेल न रह कर गली मोल्हलों के हर बच्चे का खेल हो गया। हर घर का बच्चा कपिल, गावस्कर, श्रीकांत और मोहिन्दर अमरनाथ बनने का सपना देखने लगा और इसी सपने को लेकर वो हर सुबह पांच बजे गेंद और बल्ले के साथ मैदान में पंहुच जाता। अब क्रिक्रेट खेल न होकर जुनून बन गया था जो लोगों के सिर चढ़कर बोल रहा था। जगह-जगह अकादमियां भी खुल गईं।

क्रिक्रेट के इस जुनून ने अपना रंग दिखाया और हमें कुछ ऐसे होनहार खिलाड़ी मिले कि उनकी चमक के आगे सब फीके पड़ गए। ये थे- सचिन तेंदुलकर और सौरभ गांगुली। इनके खेल से लोगों को संगीत का आंनद मिलने लगा। हर भारतीय को लगने लगा कि वो दुनिया के किसी भी क्रिक्रेट खेलने वाले देश को हरा सकता है। एक विकाशील देश के नागरिकों के लिए ये गर्व करने वाली बात थी। इन सबके बीच भारतीय क्रिक्रेट में एक ऐसा शख्स थै जिसकी वजह से विश्व क्रिक्रेट BCCI के आगे बौना हो गया। सब कुछ जैसे उसकी ही मर्जी से हो रहा था- ये था "जगमोहन डालमिया"। जगमोहन डालमिया ने BCCI को एक ऐसा क्रिक्रेट बोर्ड बना दिया जिसके पास सुपर पावर था और अकूत पैसा भी। जी हां BCCI दुनिया का सबसे धनी क्रिक्रेट बोर्ड बन गया था। अब इस जादू और चमत्कार से बाजार कैसे अछूता रहता।

वक्त ने करवट ली, भारतीय उपमहाद्वीप में विश्व कप क्रिक्रेट का आयोजन हुआ। बाजार ने क्रिक्रेट जुनून को कब क्रिक्रेट धर्म बना दिया लोगों को पता ही नहीं चला। मुझे अच्छी तरह से याद है कि रिलांयस विश्व कप के आयोजन ने देश में टीवी सेटों की बिक्री को कई गुना बढ़ा दिया था। टीवी सेटों की खरीद पर लोगों को कई तरह के ऑफर मिल रहे थे। अब हर घरों में देखने को टीवी मिल जाती थी। आपको मालुम है कि हमारे आपके घरों में टीवी किन तीन कारणों से आई -पहला रामानंद सागर के सीरियल रामायण, बी. आर. चोपड़ा के सीरियल महाभारत और क्रिक्रेट। जरा सोचिए हमारे आपके घरों में क्रिक्रेट ने रामायण, महाभारत के समानान्तर जगह बनाई। बात साफ हो गई कि क्रिक्रेट धर्म बन चुका था और हमारे क्रिक्रेटर भगवान। इस दौर में सचिन -सौरव के खेल ने कुछ ऐसा जलवा बिखेरा कि लोग अपना सब काम छोड़कर घंटों टीवी सेटों के सामने बैठने लगे। लार्ड्स के मैदान में सौरव का टीशर्ट लहराना आज भी लोगों को याद है। इनके खेल और मैदान पर आक्रमक स्वभाव ने ऐसा करिश्मा किया कि आम भारतीय खुद को विश्व पटल पर विजेता के रूप में देखने लगा। उसे लगा कि वो अब विदेशी धरती पर भी विपक्षी टीम के जबड़े से जीत निकाल सकता है।

अब बारी थी पत्रकारों की। जैसे-जैसे क्रिक्रेट का बुखार लोगों में बढ़ता गया पत्रकारों की एक लम्बी फौज खड़ी हो गई, इस फौज ने क्रिक्रेट के हर एक पहलु के बारें में लोगों को जानकारी दी। अब तो क्रिक्रेट आम भारतीयों में लहू बनकर दौड़ने लगा। इसके दो परिणाम हुए-पहला ये कि पेपर, मैगजीन और टीवी हर जगह क्रिक्रेट ही दिखने लगा जिससे दूसरे खेल उपेक्षित हो गए और दूसरा परिणाम ये हुआ कि लोगो को भी लगने लगा कि हमारे देश में सिर्फ क्रिक्रेट ही खेला जाता है। सचिन, सौरव और द्रविड की तिकड़ी ने लोगों को दिवाना बना दिया।।

इन सारी हलचलों को बाजार ने बड़ी बारीकी से पकड़ा जिससे क्रिक्रेट एक बिकाऊ गेम बन गया। बिकाऊ से मेरा मतलब ये है कि ये आन डिमांड हो गया। अब अंदर ही अंदर ही पूरा परिदृश्य बदल चुका था। पत्रकारों पर भी इसका खासा प्रेशर हो गया था - प्रेशर था क्रिक्रेट से जुड़ी हर छोटी बड़ी खबर को सुर्खियां बनाने का। सुर्खिया भी ऐसी कि आप इस बात का फैसला नहीं ले सकते कि कौन सा खिलाड़ी बेहतर प्रदर्शन कर रहा है और कौन आउट आफ फार्म। क्योंकि खिलाड़ियों के प्रदर्शन के आंकड़ों का आधार कभी पूरे साल का प्रदर्शन होता तो कभी दस टेस्ट या फिर सात, चार, तीन या दो टेस्ट। एक और चीज जो सामने आई वो ये कि टीवी पत्रकार एक दिन किसी खिलाड़ी की तारीफ करते हैं तो अगले ही दिन उस खिलाड़ी को चुका हुआ करार देते है, साथ ही उसके ढ़ेरों विकल्प। इसे एक उदाहरण से समझना होगा। अभी एक चैनल ने एक कार्यक्रम शुरू किया है- एक खिलाड़ी एक हसीना। इसमें चार या पांच जोड़िया हैं, हर जोड़ी में एक खिलाड़ी और एक ग्लमैर से जुड़ा चेहरा है जो डांस के माध्यम से अपना जलवा बिखेर रही है। चूंकि क्रिक्रेट खिलाड़ी और ग्लैमर दोनों बाजार के लिए बिकाउ हैं इसलिए हर कोई इसे कैश कराने में लग गया है। कई न्यज चैनल भी इस कार्यक्रम को काटकर अपने यहां दिखा रहें हैं और उनकी वाह-वाह कर रहें है। लेकिन अब यही क्रिक्रेटर अगर मौजूदा सीरिज में बेहतर प्रदर्शन नहीं करते तो जान लीजिए कि इनका बाजा बजना तय है। उस समय ये खिलाड़ी जो कला में पारंगत नजर आ रहें है वो सबसे बड़े खलनायक साबित होगें।

कुछ जानकार बताते है कि ये सब कुछ बाजार के इशारे पर होता है क्योंकि इससे बाजार को अपने प्रोडेक्ट बेचने के लिए कई चेहरे मिल जाते है। बाजार का गणित और क्रिक्रेट के लिए जरूरत से ज्यादा जिज्ञासा ने सब कुछ बदल कर रख दिया है। अब खिलाड़ी खिलाड़ी ना होकर एक प्रोड़क्ट बन कर रह गया है। बाजार को उसके प्रोडक्ट को बेचने के लिए अब सचिन, सौरव और द्रविड़ के चेहरे की जरूरत नहीं- उसे नए चेहरे की जरूरत है जो शायद धोनी और अन्य लोगों से पूरी होती दिख रही है।

सौरव गांगुली शायद इसी परंपरा के शिकार हुए हैं और अगले कुछ दिनों में अनिल कुंबले, राहुल द्रविड, लक्ष्मण और सचिन होगें, क्योंकि बाजार और पत्रकार चाहते कि ये सभी अपने मैचों में सैकड़ा जड़े और कम से कम पांच विकेट लें। कारण सिर्फ एक कि क्रिक्रेट एक बिकाऊ गेम बन चुका है, जिसने क्रिक्रेट धर्म की स्थापना की है और देश को नए भगवान दिए हैं। ऐसे में भगवान का ये फर्ज बनाता है कि वो अपने हर मैच में बेहतर प्रदर्शन करें नहीं तो किस बात के वे भगवान।

पोस्टेड पुनीत शुक्ला at 13:30s     5 कमेंट्स

टोटल कमेंट्स

पोस्टेड बी patil kumar

यक़ीन नही होता की बाज़ार का इतना असर खेल पेर भी है अब तो खाना होगा की सबसे बरा रुपैया ...

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पोस्टेड बी jay

सौरव एक जुझारू खिलाड़ी हैं ये उसके खेल से साबित होता रहता है,वो खेल राजनीति का शिकार है जो जोन वाइस चलती है ...

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पोस्टेड बी सजय

सौरव के शतक और आपके ब्लाग ने लोगो को जवाब दे दिया है ...

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पोस्टेड बी ramesh chandra garg

इंडिया विल्ल फ़ोरगेट इस बिंद्रा,ललित मोदी,शरद पवार बुत विल्ल नेवेर फ़ोरगेट कपिल ,सचिन, सौरव गांगुली, %26 डालमिया फ़ोर तेर कोंतरीबूतिओं तो क्रिक्केट. ...

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पोस्टेड बी devesh

ये सब बाजार और अधिक क्रिक3ट केलने और देखने का ही परिणाम है ...

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