आशुतोष
प्रीविअस पोस्ट
शुक्रवार, जुलाई 25, 2008 19:18s
एक गुलाम की जीत
चलिये आप से एक सवाल करते हैं। विश्वास मत से किसको फायदा हुआ? कौन जीता? कौन हारा? आप सोच रहे होंगे क्या बकवास कर रहा हूं? यकीन मानिये मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है। ये एक ऐसा सवाल है जो हम सब लोगों को पूछना चाहिये और इसका जवाब भी खोजना चाहिये, इसलिये नहीं कि ये सवाल अभी महत्वपूर्ण है और कुछ समय के बाद इसका मतलब नही होगा।
चलिये इस सवाल का जवाब सीधे प्रधानमंत्री से ही शुरू करते हैं। मनमोहन सिंह। देश के प्रधानमंत्री। देश को दिशा देने की जिम्मेदारी उनके कंधों पर है। उन्हें ही पूरे देश को साथ लेकर चलना है और भविष्य की भी दिशा उन्हें ही निर्धारित करनी है। इस घटना से पहले तक बीजेपी नानाप्रकार के शब्दों से उनकी ताजपोशी कर रही थी, उनकी शान में कसीदे गढ़ रही थी। सबसे मशहूर थे उनके जादुई शब्द कि "ये प्रधानमंत्री आजादी के बाद का सबसे कमजोर प्रधानमंत्री है"। कुछ लोग ये भी कह गये "ये प्रधानमंत्री निकम्मा है"।
अब जरा गौर करें। विश्वास मत की जरूरत क्यों पड़ी? आप कहेंगे कि लेफ्ट ने समर्थन वापस ले लिया इसलिए। मेरा सवाल है समर्थन वापस क्यों लिया? ये मत कहियेगा कि लेफ्ट समर्थन वापस लेना ही चाहता था। वो बात मैं महीनों से कह रहा हूं। परमाणु करार नहीं होता तो भी ये होना था। तो फिर नया क्या है। मैं बताता हूं। दरअसल ये सब कुछ हुआ मनमोहन की मनमर्जी की वजह से। जी हां, मनमोहन मनमर्जी हो गये थे पिछले दिनों। जब लेफ्ट ने धमकी देना शुरू किया तो कांग्रेस और सरकार के एक तबके ने ये कहना शुरू किया कि परमाणु करार के कारण सरकार गिरा दें ये समझदारी नहीं। करार तो फिर भी हो जायेगा लेकिन अगर सरकार गयी तो गरीब कांग्रेस को न जाने कब सरकार बनाने का मौका मिले।
ये बात जब मनमोहन तक पहुंची तो "सबसे कमजोर प्रधानमंत्री" ने अचानक "सबसे मजबूत प्रधानमंत्री" बनने का सपना पाल लिया। उन्होंने साफ कह दिया। करार नहीं तो मनमोहन नहीं। मनमोहन जिनकी राजनीति में सबसे बड़ी पूंजी है सबसे कमजोर होना। मनमोहन के इस नये रूप से सब चौंक पड़े। अरे! ये क्या? उन्हें समझाने की बहुतेरी कोशिश हुई लेकिन ये अर्थशास्त्री अड़ गया। टस से मस नहीं। मैसेज साफ था। "मैं उतना कमजोर नहीं जितना आप लोग समझते हैं। राजनीति में भले ही मेरी पकड़ न हो लेकिन देश के हित में क्या है ये मैं बहुत अच्छी तरह से जानता हूं। और मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता कि देश को कितनी ज्यादा इस करार की आवश्यकता है। मेरी सेहत पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि करात रहें या नहीं क्योंकि इस मुद्दे पर मैं जानता हूं कि आज देश को करात नहीं करार चाहिये। "
दरअसल मनमोहन को इस देश ने हमेशा ही काफी कम कर आंका है। मनमोहन वो शख्स हैं जिनकी इस देश को भविष्य का सुपर पावर बनाने के लिये तारीफ की जानी चाहिये लेकिन ऐसा हुआ नहीं। आर्थिक सुधारों की शुरुआत मनमोहन सिंह ने की। उन्होंने नरसिंह राव के वित्त मंत्री के तौर पर देश की आर्थिक सोच को मूलभूत तौर पर बदलने का काम किया है। 1990 के पहले तक ये समझ तो बनने लगी थी कि समाजवादी और साम्यवादी मॉडल पिट चुका है और इस रास्ते पर चलते-चलते देश को बचाने के लिये सोना गिरवी रखने की फजीहत से जूझना पड़ा है। ऐसे में इस रास्ते पर चल कर देश का सिर्फ बेड़ा गर्क हो सकता है। और ऐसे में जरूरत है कुछ मौलिक चिंतन और मौलिक सुधारों की। और ये सोचने की कि क्या ये देश अपनी पुरानी नेहरूवादी सोच की गिरफ्त से निकलने को तैयार है या नहीं। इस देश में नेहरूवादी समाजवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं। तर्क ये दिये जाते थे कि गड़बड नेहरूवाद में नहीं बल्कि गड़बड़ इस सोच को जमीन पर उतारने में है। यानी सत्ता में बैठे लोग आर्थिक नेहरूवाद को सही तरह से अमली जामा नहीं पहना पा रहे हैं।
मनमोहन की किस्मत थी कि उस वक्त नरसिंहराव जैसा व्यक्ति न केवल विचार के स्तर पर ये सोचने के लिये तैयार था बल्कि इस बात के लिये भी तैयार था कि जरूरत पड़ी तो नेहरूवाद को त्याग कर उदारवाद का रास्ता भी पकड़ा जा सकता है। नरसिंहराव का नेहरू - गांधी परिवार का न होना भी शायद मनमोहन के हक में गया। नेहरू - गांधी परिवार के लिये नेहरू को छोड़ना काफी मुश्किल होता और शायद छोड़ भी नहीं पाता। लेकिन इतिहास और नीयति के अपने तर्क होते हैं और उसका काम करने का अपना तरीका।
शायद भारत की किस्मत ने पलटी मारना तय कर लिया था। तो समय रहते इतिहास के कूड़ेदान से निकाल कर नरसिंहराव को प्रधानमंत्री बना दिया और न जाने किस सोच ने उन्हें कहा कि मनमोहन को वित्त मंत्री की कुर्सी सौंप दो। मनमोहन का वित्तमंत्री बनना मेरी नजर में पिछले बीस सालों का सबसे बड़ा पॉलिटिकल मास्टर-स्ट्रोक है। ये हो सकता है कि उनकी जगह कोई और होता तो भी शायद यही नतीजा होता लेकिन उसकी तारीफ क्यों न करें जो सामने है और उसका सियापा क्यों, जो नहीं है।
मनमोहन की जगह कोई राजनीतिज्ञ होता तो इस रास्ते की शुरुआत काफी मुश्किल होती। उसे इतिहासबोध होता , नेहरू से जुदा होने का दर्द और सबसे बड़ी बात राजनीतिज्ञों में ईमानदारी से चीजों को देखने की आदत नहीं होती है। वो अपने नफा नुकसान में लगा होता, ये सोचता कि ये करने से वोट मिलेगा या नहीं, लोग क्या सोचेंगे?
ये अनायास नहीं था कि नरसिंहराव के जमाने में अर्जुन सिंह की अगुआई में एक गुट ने आर्थिक सुधारों को कांग्रेस से आम आदमी के दूर होने से जोड़ दिया। कहा गया, आर्थिक सुधारों से ये संदेश गया कि कांग्रेस सिर्फ पूंजीपतियों का ख्याल रख रही है और उसे देश के गरीबों की कतई चिंता नहीं है। 1995 में जब कांग्रेस बुरी तरह से हारी तब भी यही तर्क दिये गये। लेकिन तब तक देश की अर्थव्यवस्था को बदलना किसी के बस में नहीं था। वो उस हाई-वे पर दौड़ रही थी जहां से आगे तो जाया जा सकता है, रुकने और वापस लौटने का अर्थ है दुर्घटना को न्यौता देना। यही वजह है 2004 में "6% विकास दर" और "शाईनिंग इंडिया" के बावजूद वाजपेयी सरकार हार गयी लेकिन लेफ्ट के समर्थन से खड़ी मनमोहन सरकार ने पीछे लौटने की हिम्मत नहीं की।
भले ही सेकुलरवाद की आड़ में कांग्रेस और लेफ्ट ये कहें कि दोनों ही एक दूसरे के नेचुरल ऐलाइज हैं लेकिन मनमोहन और प्रकाश करात क्यों एक-दूसरे के साथ चार साल खड़े रहे ये कभी मुझे पचा नहीं। बीसवीं सदी की सबसे बड़ी लड़ाई उदारवाद बनाम साम्यवाद के बीच रही है। करोड़ों लोगों को इस जंग की वजह से अपनी जान से हाथ धोना पड़ा। दुनिया में कभी भी विचारधारा के नाम पर इतने बड़े स्तर पर हिंसा नहीं हुई और न ही इतने बडे़ पैमाने पर लोगों को मौत की नींद सुलाया गया। इसलिये मैं शुरू से हैरान था और जानता था कि ये दोनों ज्यादा साथ चलने वाले नहीं और जब भी अलग होंगे सरकार पर संकट होगा। ऐसे में करात ने समर्थन वापस लिया तो मैं चौंका नहीं। ये तो होना ही था। हैरानी इस बात पर हुई कि इतना वक्त क्यों लगा?
मनमोहन ने विश्वास मत पर दिये अपने भाषण में लिखा कि लेफ्ट उन्हें अपना गुलाम बनाना चाहता था। और वे इसके लिये तैयार नहीं थे। परमाणु डील और मनमोहन की सोच को 2008 के आईने में देखना शायद गलत होगा। हकीकत ये है कि परमाणु डील का होना उसी वक्त तय हो गया था जब नरसिंहराव ने नेहरूवाद को छोड़ने का मन बनाया था। ये सोच भारत को अमेरिका के करीब लाती। दोनों के दरम्यान नेहरूवाद के बीच का रास्ता निकालने की नीति दम तोड़ चुकी थी। ये डील सिर्फ दो देशों के बीच की डील नहीं है, ये डील दो देशों के एक वैचारिक पृष्ठभूमि पर एकाकार होने का सबूत है। मुझे इसमें कोई बुराई नजर नहीं आती।
हिंदुस्तान को अगर सुपर पावर बनना है तो उसे उदारवाद के रास्ते पर चलना ही होगा। अमेरिका से दोस्ती करनी ही होगी। मनमोहन इस आर्थिक और सामरिक नीति और दर्शन के जीते जागते प्रतीक हैं। और सही ये है कि उदारवाद भले ही साम्यवाद और समाजवाद की तुलना में कम मजबूत दिखे, स्टालिन की तुलना में ट्रूमेन का व्यक्तित्व कमजोर दिखे, निर्णायक न लगे लेकिन इस बात का गवाह तो इतिहास है कि एटम बम फोड़ने की हिम्मत तमाम दिमागी मजबूती के बावजूद साम्यवाद नहीं कर पाया, ये बम फोड़ा तो उदारवादी अमेरिका ने और फिर भी वो दुनिया के नक्शे पर क्रूर नहीं कहलाया जैसा स्टालिन के बारे में कहा गया। आज भी अगर मनमोहन और कारत में तुलना होगी तो मनमोहन की छवि मोहक होगी, मासूम होगी और कारत की कट्टर और निष्टुर।
तो मनमोहन की खूबसूरती ही ये है कि वो मुलायम दिखते हुए भी बेहद कड़े और इतिहास में बदलाव लाने वाले निर्णायक फैसले कर सकते हैं। दो बार वो कर चुके हैं। आर्थिक सुधारों की शुरुआत और अमेरिका से परमाणु डील इसके उदाहरण हैं। दूसरी ओर प्रकाश करात तमाम कड़े तेवरों के बावजूद इतिहास बदलने वाले फैसले नहीं कर पाये। वो ये नहीं कर पाये कि ज्योति बसु प्रधानमंत्री बनें, सोमनाथ उप राष्ट्रपति, हां... विचारों की भेड़चाल में सोमनाथ को पार्टी से अलग निकाल दिया। ये सोच की जकड़न है और जब तक ये जकड़न रहेगी तब तक मनमोहन अपनी मुलायमियत के बावजूद अमर रहेंगे और करात सिर्फ माया ही खोजते रहेंगे। इसलिये सवाल ये है कि जीता कौन और हारा कौन ? क्या अब भी मैं बताऊं की कौन जीता, कौन हारा?
पोस्टेड आशुतोष at 19:18s 43 कमेंट्स
टोटल कमेंट्स
पोस्टेड बी Sunil
आपने बहुत तारीफ़ कर दी मनमोहन सिंघ की. अब मैं कुछ बोलूं. ये वो ही पम हैं जिसनेय कहा था की बी जे पी मुझे मरवनेई के लीय पूजा कर रही है. उन्होने कहा की राष्ट्र के संसाधनों पर पेहला हक़ अल्प संख्यकों का है. उन को नीद नः आती जब कोई क़ाफ़ील को औसतरलीया में गिरफ़्तार कर लिया जाता है. पर जब भारत मेई बोम्ब ब्लास्ट होते हैं तो वो चैन से सोते हैं. ...
पोस्टेड बी aditya verma
डियर आशुतोष जी, आपकी पत्रकारिता के तेवर हमेशा से ही मुझे बहुत पसंद रहे है. इसबार आप के लेख ने भारत-अमेरिका परमाणु क़रार पर प्रधानमंत्री की मज़बूती तो ज़ाहिर कर दी, और हमे एक नये नज़रिए से सोचने की समझ दी है. धन्यवाद. ...
पोस्टेड बी vishal bansal
में आपकी पत्रकारिता का कायल हू. मेंने एंगिनीरींग इसी साल कोंप्लेटे की है null .null मेडिया में null की null null है .मूज़े null है की एक पत्रकार null की null null null null है null (null /null /null null,null null null null null, null null, null null null null) null null null null मेडिया null null में null null हुईं null इस null में. ...
पोस्टेड बी santosh kumar rai
सिर मैं आपका बहुत बड़ा फ़ैन हू मैं इबन7 को रोज़ देखता हू मुझे आपके चाननेल का नेवस देने का अंदाज़ बहुत पसंद है. और मैं भगवान से दुआ करता हू की आपका चाननेल दिन दूनी रात चाओगनि तर्की करे आज मैं जल्दी मैं हू फिर कभी मैं फिर कोममेंट पर जबाब दूँगा ...





























पोस्टेड बी Praveen Singh
आशुतोष जी, मैं आपको बहुत पसंद करता हूँ और आपका वादबिबाद बहुत डेकटा हूँ. मैं भी आपकी बिचारधारा मे बहुत यक़ीन करता हूँ, लेकिन मैं इस बारे मैं बहुत सोचता हू की मुस्लिम समाज मैं भी बहुत बूद्डीजीवी है लेकिन जब बात आतंकबाद की होती है वो भी इसको ग़लत तहराते है. वकिएे मे मुस्लिम समाज़ को ख़ुद सोचना पड़ेगा की क्यों वो लोग आज पूरे बिश्व मैं अलग तलग हो रहे है इन लोगो को नही भूलना छाईए की आज कश्मीर मैं एअक भी कश्मीरी पंडित नही है. और जब आतंकबादी इतने निर्दोष लोगो की हत्या करते है तो ये लोग तब क्यो कोई रैली नही निकलते , और साथ मे अमर सिंघ ,लालू और पासवान जी को की क्यों बोट के चकर मैं आप देश को बाँटते हो. ...
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