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अरे बेताल! उड़ता कहां है...रुक..

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Place : AKHANDATA
" ये नेता न बनते अगर जनता न चुनती। ये कलयुगी जनता है जो ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाती है।" सपने में आप ने अपना ग़ुस्सा देश की निरीह जनता पर निकाल दिया. आख़िर क्यों नहीं निकालें. सब तो इसी जनता का शोषण करते हैं. फिर भला पत्रकार क्यों पीछे रहें. कुछ को छोड़ कर आख़िर मीडिया भी क्या कर रही है. सत्ताभोगीयों के साथ हाँ में हाँ मिलाते रही है.

दुर्भाग्य से, ये सारी घटनाएँ जिनका ज़िक्र आप ने किया है वैसे समय में हो रहीं हैं जब देश के नेता बहिचर्चित मशहूर अर्थशास्त्री हैं, न्युक-समझौता के लिए अपनी सरकार को भी दाँव पर लगा देने के लिए विख्यात हैं. ऐसे प्रधानमंत्री के सर पर उस शाख़्षीयत का आशीर्वाद है जिसने प्रधानमंत्री का पद तक त्याग दिया था. भारत के गृह मंत्री भी साफ़-सुथरी प्रकृति वाले व्यक्ति हैं. ऐसे में आप कैसे कह सकते हैं की जनता ने वोट देने में भूल की.

असल में नेताओं में परिवर्तन चुन कर आने के बाद हो जाता है. यह परिवर्तन और बढ़ जाता है जब ऐसे नेताओं को कोई मंत्री पद मिल जाता है. तथा कोई ख़ास पद मिलने पर तो परिवर्तन ख़ास हो जाता है. जहाँ उन्हें अपने दायित्वों से ज़्यादा चिंता वोट के लिए होती है, जाती-धर्म-भाषा-क्षेत्रवाद या प्रांतवाद के मद्देनज़र वोटों की गिनती करते हैं किसी सही क़दम का असर उनके वोट-बैंक पर प्रतिकूल पड़ता दिखता है तो वैसा क़दम वो नहीं उठाते हैं. फिर चाहे आम लोगों की हत्याएँ हों या माँ-बहनों के साथ ब्लातकार या दुर्व्यवहार हो या आम संपाति का नुकशान हो या देश की एकता-अखंडता के साथ खिलवा ड हो.

ऐसे में अगर आम आदमी में से कुछ प्रतिशोध की भावना से हिंसा पर उतारू हो जाते हैं तो आश्चर्य की क्या बात है.

देश की न्यायपालिका वैसी दूधारु गाय बन गयी है जिसे अपराधी मनमाने ढंग से दुहते रहते हैं. आप किसी को स रे-आम गाली दीजिए, पूरी जाती या धर्म के लोगों के बारे मनमानी बातें खुल कर करें, खुले मे किसी को मार दें---क़ानून आपका बाल भी बांका नहीं कर सकता है यदि आप अपराधिक प्रवृति के आदमी हैं. किसी तरह अगर मामला अदालत तक पहुँच भी गया तो आप को तुरंत बेल मिल जाएगा--इसका आप को पूरा एहसास रहता है. केस चलता है, महीनों नहीं वर्षों लग जाते हैं फ़ैसला आने में--तबतक सबूत-गवाह या तो धूमिल हो जाते हैं या ख़त्म हो जाते हैं या ख़त्म कर दिए जाते हैं. इस तरह इन सत्ताभोगीयों की कारगुज़ारी भ्रष्ट तथा अपराधियों के साथ मिलीभगत से चलती रहती है. आम जनता अगले चुनाव में फिर किसी को चुनती है तथा वो भी ऐसा ही करने लगते हैं. क्म से क्म आज़ादी के बाद से ती यही सिलसिला जारी है.

समाजवा दियों से या साम्यवादियों से थोड़ी उम्मीद की जा सकती है पर उनके पीछे तो निहित स्वार्थ वालों से भी ज़्यादा मीडिया पिल पड़ी रहती है उन्हें सबसे बुरा बताने में, जनता को गुमराह करने में. उनका बोलबाला सत्ता के इर्द-गिर्द बिरले हीं पहुँच पाता है. मिलीजुली सरकारों में उनका इस्तेमाल किया जाता है और जब वे अनुचित ढंग से इस्तेमाल किए जाने पर आप ती करते हैं तो उन्हें निकाल बाहर कर दिया जाता है.

ये सारी गड़बड़ी है भ्रष्टाचार द्वारा इकट्ठा किए गये धन के कारण. इस धन को ज़ब्त कीजिए, सब कुछ ठीक हो जाएगा. पर बड़ा सवाल है ऐसा कौन करेगा. अगर कोई ज़बरदस्ती करेगा तो उसे अतिवादी क़रार दे दिया जाएगा..

ख़ैर आप का सपना बड़ा अदभुत है. यह साबित करता है की आप सपने में भी देश की दुर्दशा पर चिंतित रहते हैं. पर पत्रकारों को सो कर नहीं, समस्यायों को परोक्ष में नहीं बल्कि प्रत्यक्ष रूप से सत्य उगलना चाहिए जैसे आय बी एन -7 के संदीप चौधरी करते हैं. अंतत: मैं सच्चे पत्र पत्रकारों की सीमाओं को भी महसूस करता हूँ.

( Posted: Monday , November 10, 2008 at 17:04 )        

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