अफसर अहमद

मेरी मर्जी

अफसर अहमद

प्रीविअस पोस्ट

प्रीविअस पोस्ट

सोमवार, नवंबर 10, 2008 07:06s

अरे बेताल! उड़ता कहां है...रुक..

Email Print

दिनभर खबरों से जूझते-जूझते रात में भी उन्हीं के सपने आते हैं... क्या करूं समझ नहीं आता। हाल ही में मुझे एक सपना आया। मैं एक नई दुनिया में था। मेरे आसपास वीरानी छाई हुई थी। मैं परेशान कहां आ गया। खबरों की चिल्ल पों से दूसरी ये सूनामी सन्नाटा परेशान करने वाला था। आस पास सूखे पेड़ नजर आ रहे हैं। ऐसे एक पेड़ के करीब से गुजरते वक्त मुझे ऐक मरियल सा आदमी धोती लपेटे पेड़ पर उल्टा लटका नजर आया।

मैं सकते में था कि कहीं यह बाबा कोई उल्टा लटक योग तो नहीं कर रहे। मैंने पास जाकर पूछा - बड़े मियां ये कौन सा योग कर रहे हैं। अचानक उन्होंने मेरी तरफ गुस्से से देखा फिर पैंतरा बदलते हुए मुस्कुराने लगे। बोले अरे निखट्टू मैं तुम्हारा ही इंतजार कर था। चलो चलो मुझे जल्दी पेड़ से नीचे उतारो। टाइम खोटी मत करो वरना में तुम्हारे सिर के हजारों टुकड़े कर दूंगा। मैं डर गया।

मैंने पूछा आप कौन, अजीब से इंसान ने जवाब दिया अरे ढक्कन, मैं बेताल हूं...मुझे नीचे उतार। मैं डर गया। लगा सोचने कि अबे ये पुरानी फफूंद मेरे गले लगने वाली है। खैर मैंने पैंतरा मारा, बोला उतार दूंगा पर दो शर्त हैं। बेताल महाशय बड़ी अजीब सी नजरों से मुझे देखने लगे। फिर कोई चारा न देख बोले, चल बता तेरी क्या शर्तें हैं।

मैं बोला, पहली कि आप सवाल जवाब में मेरे सिर के टुकड़े नहीं करेंगे और जब तक मैं न कहूं उड़कर नहीं जाएंगे। बेताल ने कुछ देर सोचा फिर हां कह दी।

मैंने उसे उतार लिया। उसने मुझसे पूछा बताओ तुम किस युग के प्राणी हो। मैंने जवाब दिया कि मैं कलयुग का प्राणी हूं। बेताल ने फिर मेरी तरफ घूर कर देखा। बोला, तभी मैं कहूं तुम इतनी अकल कैसे चला रहे हो। बेताल ने पूछा चलो बताओ तुम्हारे यहां का राजा कौन है। मैं मुश्किल में पड़ गया। मैंने कहा मियां आपके जमाने गए जब आप विक्रमादित्य की पीठ पर लटककर बार-बार उन्हें परेशान किया करते थे। अब कोई राजा वाजा का सिस्टम नहीं है। अब तो नेता ही राजा होता है।

बेताल ने कहा यार कुछ कलयुग के हाल बताओ, आजकल ये नेता क्या कर रहे हैं बताओ। अच्छा बताओ तुम्हारा सबसे बड़ा नेता कौन है, मेरे लिए ये सवाल मुश्किल था खैर मैंने जवाब दिया। जी जनाब मनमोहन जी हैं। बेताल ने अचरज से पूछा कि तो फिर ये बहुत ताकतवर होंगे। हां मैंने कहा कि ये इतने ताकतवर हैं कि पूरे देश में ऊधम मचा रहता है और ये सिर्फ ये कहते रहते हैं, हां मैंने फलां मुख्यमंत्री से बात कर ली है या हम हालात पर नजर रख रहे हैं। बेताल ने कहा ये मुख्यमंत्री क्या बला हैं। मैंने कहा जनाब ये इस देश की सबसे बड़ी बला हैं। कुछ तो ठीक ठाक हैं बाकी आजकल वोट की राजनीति करने में लगे हैं। एक जनाब के सूबे में नन से बलात्कार हो गया और वो कहते हैं कि नन सहयोग ही नहीं करती जांच को कैसे आगे बढ़ाएं। बेताल ने फिर पूछा ये बताओ कि वोट क्या चीज है। मैं खीजने लगा था कि इन बुढऊ की समस्या क्या है सवाल पर सवाल पूछे जा रहे हैं। मैंने अर्ज किया जनाब आप सवाल पर सवाल क्यों पूछे जा रहे हैं बेताल ने जवाब दिया सुनो मिस्टर ये मेरा पुश्तैनी धंधा है। सवाल नहीं पूछूंगा तो जिंदा कैसे रहूंगा। मैंने मन में सोचा लगता है कि हम पत्रकार बेताल के वंशज ही हैं जो सवाल को अपना चारा समझते हैं। वैसे वो पत्रकार ही क्या जो दिन में दो चार सवाल न कर ले। हा हा दिल को खुशी हुई। हमारे कुलदेवता जो मिल गए। दिल गदगद हो गया।

खैर मैंने उन्हें जवाब दिया हुजूर ये वोट लोकतंत्र का आधार हैं। आम जनता अपना वोट देकर ही नेता या कहें राजा चुनती है। बेताल खुश होकर बोला वाह-वाह क्या बढ़िया चीज है यानी राजा को प्रजा चुनती है, यहां वंश परंपरा नहीं होती है। मैं फिर मुश्किल में पड़ गया। इसका जवाब देना इसलिए मुश्किल है क्योंकि अब भी तो यही होता है। मैंने कहा कि फिर कुछ बोलो तो बड़े मियां सवाल दागने लगेंगे तो यह सोचकर चुप हो गया।

लेकिन बेताल था कि चुप ही नहीं हो रहा था। उसने फिर सवाल दागा कि मित्र ये लोकतंत्र किस चिड़िया का नाम है। मैंने कहा कि यह हमारे देश के साथ अब तक का सबसे बड़ा मजाक है। बेताल बोला वो क्यों, मैंने कहा वो इसलिए कि यहां लोकतंत्र के नाम पर जाति, धर्म और क्षेत्रवाद को आधार बनाकर चुनाव लड़ा जाता है। हमारे नेता सॉरी राजा इसी को आधार पर चुनाव जीतते रहते हैं। बेताल ने फिर अचरज से पूछा कि सेनापति फिर किस मर्ज की दवा हैं। मुझे फिर झल्लाहट हुई एक तो बुढ़ऊ पीठ पर सवार और उस पर सवाल पर सवाल दागे जा रहे थे मैंने बोला मियां यहां कोई सेना वेनापति नहीं होता। यहां तो मूई पुलिस होती है जो घोर निकम्मी होती है। और नेता जो कहते हैं वैसा ही करती है।

यह सुन बेताल मुंह लटकाकर बोला- अरे ये तो संकटकाल है। मैंने कहा पूछो मत- हमारे भारत के हाल ठीक नहीं हैं। कभी जामिया, कभी कंधमाल, कभी राज ठाकरे सभी रहकर-रहकर भारत को बुरे सपनों की तरह डराते रहते हैं। हमारा भारत आजकल बहुत उदास रहता है।

बेताल ने बड़े अचरज से पूछा कि बिना तीर तलवार के इतनी टेंशन कैसे हो गई भाई। मैंने जवाब दिया कि यह सब वोटों का खेल है। चुनाव आने को हैं नेता फिर सत्ता की मलाई खाने का मौका नहीं खोना चाहते। इसीलिए कोई एनकाउंटर पर राजनीति करने लगता है तो कोई बम फोड़ू संगठन सिमी से पाबंदी हटाने की बात करने लगता है। और तो और प्रांतवाद के नाम पर कुछ नेता आम नागरिकों को तंग करने से भी बाज नहीं आ रहे। तो कुछ सोच रहे हैं कि कंधमाल में चर्च जलाकर वोट हासिल कर लेंगे। अजीब सी कहानी है। अब भारतवासी- हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, बिहारी, भईया, मराठी में बंट गया है। सब गाल बजा रहे हैं, सत्ता की मलाई जो खानी है। सत्ता आए चाहे भारत की एकता दांव पर लग जाए।

बेताल ने बड़े अचरज से पूछा कि जब राजा इतने भ्रष्ट हैं तो फिर उनका तख्तापलट क्यों नहीं होता। मुझे हंसी आई और गुस्सा भी। मैंने जवाब दिया कि दोष राजा का नहीं इसी जनता का है। इसी ने इनकी आदत बिगाड़ी है। जब जाति ने नाम पर वोट मांगा जाता है जब धर्म के नाम पर वोट मांगा जाता है तो यही जनता इन राजाओं को चुन लेती है। अब काहे का रोना। जिसे चुना उसी ने तो घर में आग लगाई है। ये नेता न बनते अगर जनता न चुनती। ये कलयुगी जनता है जो ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाती है।

बेताल ने पूछा इसका हल क्या है। मैंने कहा मियां हल चुनाव हैं। चुनाव खत्म हो जाएंगे बवाल अपने साथ ले जाएंगे।

बेताल कुछ सोचकर कुटिल हंली मुस्कराया और बोला- अरे डिंबक मैं चलता हूं। मैं बोला ये तो वादाखिलाफी है। आप मेरी अनुमति के बिना नहीं उड़ सकते। बेताल ठहाके लगाकर हंसने लगा और बोला- सुन कलमघिस्सू, ये कलयुग है...यहां वादों का कोई मोल नहीं। खैर मना कि मैंने तेरे सिर के हजार टुकड़े नहीं किए। चल अब चलता हूं। इतना कह बेताल हवा में उड़ चला। मैं चिल्लाया अरे बेताल! उड़ता कहां है...रुक...

तभी मेरा सपना टूट गया। मुझे याद आया कि मैंने भी कई बार वोट नहीं दिए हैं। मैं भी इसी गड़बड़ सिस्टम का हिस्सा हूं। मैं चिंता तो जताता हूं पर वोट देने नहीं जाता हूं। इसलिए इस बार मैं अपनी यह गलती सुधारूंगा..क्या आप ऐसा करेंगे?

पोस्टेड अफसर अहमद at 07:06s     1 कमेंट्स

टोटल कमेंट्स

पोस्टेड बी tpod

%22 ये नेता न बनते अगर जनता न चुनती। ये कलयुगी जनता है जो ऐसे नेताओं को आगे बढ़ाती है।%22 सपने में आप ने अपना ग़ुस्सा देश की निरीह जनता पर निकाल दिया. आख़िर क्यों नहीं निकालें. सब तो इसी जनता का शोषण करते हैं. फिर भला पत्रकार क्यों पीछे रहें. कुछ को छोड़ कर आख़िर मीडिया भी क्या कर रही है. सत्ताभोगीयों के साथ हाँ में हाँ मिलाते रही है.दुर्भाग्य से, ये सारी घटनाएँ जिनका ज़िक्र आप ने किया है वैसे समय में हो रहीं हैं जब देश के नेता बहिचर्चित मशहूर अर्थशास्त्री हैं, न्युक-समझौता के लिए अपनी सरकार को भी दाँव पर लगा देने के लिए विख्यात हैं. ऐसे प्रधानमंत्री के सर पर उस शाख़्षीयत का आशीर्वाद है जिसने प्रधानमंत्री का पद तक त्याग दिया था. भारत के गृह मंत्री भी साफ़-सुथरी प्रकृति वाले व्यक्ति हैं. ऐसे में आप कैसे कह सकते हैं की जनता ने वोट देने में भूल की.असल में नेताओं में परिवर्तन चुन कर आने के बाद हो जाता है. यह परिवर्तन और बढ़ जाता है जब ऐसे नेताओं को कोई मंत्री पद मिल जाता है. तथा कोई ख़ास पद मिलने पर तो परिवर्तन ख़ास हो जाता है. जहाँ उन्हें अपने दायित्वों से ज़्यादा चिंता वोट के लिए होती है, जाती-धर्म-भाषा-क्षेत्रवाद या प्रांतवाद के मद्देनज़र वोटों की गिनती करते हैं किसी सही क़दम का असर उनके वोट-बैंक पर प्रतिकूल पड़ता दिखता है तो वैसा क़दम वो नहीं उठाते हैं. फिर चाहे आम लोगों की हत्याएँ हों या माँ-बहनों के साथ ब्लातकार या दुर्व्यवहार हो या आम संपाति का नुकशान हो या देश की एकता-अखंडता के साथ खिलवा ड हो.ऐसे में अगर आम आदमी में से कुछ प्रतिशोध की भावना से हिंसा पर उतारू हो जाते हैं तो आश्चर्य की क्या बात है.देश की न्यायपालिका वैसी दूधारु गाय बन गयी है जिसे अपराधी मनमाने ढंग से दुहते रहते हैं. आप किसी को स रे-आम गाली दीजिए, पूरी जाती या धर्म के लोगों के बारे मनमानी बातें खुल कर करें, खुले मे किसी को मार दें---क़ानून आपका बाल भी बांका नहीं कर सकता है यदि आप अपराधिक प्रवृति के आदमी हैं. किसी तरह अगर मामला अदालत तक पहुँच भी गया तो आप को तुरंत बेल मिल जाएगा--इसका आप को पूरा एहसास रहता है. केस चलता है, महीनों नहीं वर्षों लग जाते हैं फ़ैसला आने में--तबतक सबूत-गवाह या तो धूमिल हो जाते हैं या ख़त्म हो जाते हैं या ख़त्म कर दिए जाते हैं. इस तरह इन सत्ताभोगीयों की कारगुज़ारी भ्रष्ट तथा अपराधियों के साथ मिलीभगत से चलती रहती है. आम जनता अगले चुनाव में फिर किसी को चुनती है तथा वो भी ऐसा ही करने लगते हैं. क्म से क्म आज़ादी के बाद से ती यही सिलसिला जारी है.समाजवा दियों से या साम्यवादियों से थोड़ी उम्मीद की जा सकती है पर उनके पीछे तो निहित स्वार्थ वालों से भी ज़्यादा मीडिया पिल पड़ी रहती है उन्हें सबसे बुरा बताने में, जनता को गुमराह करने में. उनका बोलबाला सत्ता के इर्द-गिर्द बिरले हीं पहुँच पाता है. मिलीजुली सरकारों में उनका इस्तेमाल किया जाता है और जब वे अनुचित ढंग से इस्तेमाल किए जाने पर आप ती करते हैं तो उन्हें निकाल बाहर कर दिया जाता है.ये सारी गड़बड़ी है भ्रष्टाचार द्वारा इकट्ठा किए गये धन के कारण. इस धन को ज़ब्त कीजिए, सब कुछ ठीक हो जाएगा. पर बड़ा सवाल है ऐसा कौन करेगा. अगर कोई ज़बरदस्ती करेगा तो उसे अतिवादी क़रार दे दिया जाएगा..ख़ैर आप का सपना बड़ा अदभुत है. यह साबित करता है की आप सपने में भी देश की दुर्दशा पर चिंतित रहते हैं. पर पत्रकारों को सो कर नहीं, समस्यायों को परोक्ष में नहीं बल्कि प्रत्यक्ष रूप से सत्य उगलना चाहिए जैसे आय बी एन -7 के संदीप चौधरी करते हैं. अंतत: मैं सच्चे पत्र पत्रकारों की सीमाओं को भी महसूस करता हूँ. ...

इस कमेंट पर अपनी राय दें

ज़िंदगी लाइव

मुसीबतों, परेशानियों, हादसों और कुदरत के कहर में फंस कर...

सारे शो देखें »

क्या आपको लगता है कि भारत के दिए सबूतों पर पाक कोई कार्रवाई करेगा?

हां

नहीं

पता नहीं

हमारे बारे में | विज्ञापन | हमें बताइए | RSS

कॉपीराइट IBN7 खबर। सर्वाधिकार सुरक्षित