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यूं मरने के लिए नहीं हम हिंदुस्तानी

सारे कमेंट्स: 9

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sanjay
Place : Delhi
मेरे देशबा सिओ हिम्मत से काम लो,उस ईश्वर प र बिश्वास र खे बो रा ह ज रु र दिखाएगा, इस स सा र को र च ने बाले से ज़्यादा को न स म झ दा र हो स क ता हे, बिश्व के कल्याण की कामना क रे. ईश्वर स ब को शांति दे.

( Posted: Sunday , November 02, 2008 at 23:45 )        

Prem
Place : London
आप भी जानते हैं और नेता-लोग भी जानते समजते हैं के एक हज़ार साल से हिंदुस्तानी को तो मरने की आदत हो गयी है, उसकी मानसिकता हो गयी है मरने की और गुरु-लोग भी ऐसी बातें ही सिखाते हैं. कुछ लोग मारना जानते हैं और कुछ लोग मरना जानते हैं. बस . आप क्यों परेशान हैं.

( Posted: Sunday , November 02, 2008 at 18:35 )        

Sanjay
Place : Hindustan
हल ह म ने सोच लिया हे, अरे ब हू त हो ग या.

( Posted: Sunday , November 02, 2008 at 02:19 )        

saifi
Place : delhi
मुझे आज भी याद है जब मैने थे दी देली मा सेरियल बूम ब्लास्ट हुआ हा तो मा सोक्क रे गया और लगा हो सकता है मा भी इसका सिकर हो गया होता या जो लोग इसके सिकर हू हा उन्हे खबार मे देखकर लगातार 3घंटे तक एक जगह पर उसे देखता रहा . और मुझे नही लगता किसी इंडियन को ये ख़बर देखकर अच्छा लगा हो कुछ अच्छा करने का दिल चाहा हो जिसने इसे अचानक सुनो हो. पर मेरी समाज मे ये नः आता की हमारे देश का वो मंत्री ज के उपेर देश की सुरखा की जीमदारी है वो ईसब कैसे सुकार सोक्क नही होता और ख़बर को सुनने के बाद 3 बार अपने ड्रेस्स को चांगे करते की मेरे ख़्याल से तो या तो मंत्री जी को पेहले से ही पता था की यहा बूम विस्फोट होगे तभी तो वो एअक दूं नोर्मल दिखे और सिदे पर झा बूम विकफ़ोट हुआ यहे हाथ हिलकेर ज़ञता को ब्दैया दे रहे था मे अपने दोस्ते से खने चटा हू ज़रा इसपर गौरे करे क्यो औम भी इसे ही करते अगर अकनक इतने बड़े बूम विचफ़ोट की ख़बर सुनते तो हमारे मंत्री जी करते है तो इसका क्या मतलब है ............. खाए ये दल मा कुछ कला तो नही.......

( Posted: Saturday , November 01, 2008 at 22:55 )        

saifi
Place : delhi
पहले तो मे ये केहना चौगा की इज़ कल हमारे देश मा लगातार बूम विस्फोट हो रहे है. अगर य विकफ़ोट सिर्फ़ आटंगवदी कर रहे है ट वो अचनत जब हमारे देस मा चुनाव का समय करेब है तभी क्यो ज़्यादा कर र है ये बात सोचने की है अगर गोरे से सोचे तो लगता है ये चुनोव की वजह से हो रहे है आग इसका इस मतलब किसी राजनटिक पार्टय से है तो वो कों सी हो सकती है किसको इसका फ़ायदा है. आख़िर क्यो अब लगता बूम विस्फोट हो रहे है इसमे .........................

( Posted: Friday , October 31, 2008 at 22:59 )        

Khurshid A. Ansari
Place : Delhi
राजनीति ..........राजनीति............ सिर्फ़ राजनीति.
उस देश में आतंकवाद का ख़ात्मा कैसे हो सकता है जिस देश में बिना किसी सबूत के एन्कौंतर कर दिया जाता है, और उसे सच साबित करने के लिए एक पुलिस वाले की बली दे दी जाती है. फिर एन्कौंतर के विरोध में राजनीति होती है, फिर एन्कौंतर के न्यायिक जाँच की माँग के विरोध राजनीति होती है.
फिर बी जे पी के सहयोगी घटकों के द्वारा किए गये आतंकवाद पर्दाफ़ाश होता है, फिर बी जे पी द्वारा अपने आतंकवादियों के बचाव की राजनीति शुरू होती है.
आडवाणी जी प्रधानमंत्र बनने की लालसा में अपनी आधार बनाने के लिए असम जाते हें, और वहाँ असम गण परिसद जेसे अपने ही जेसे विघटनकारी पार्टी से हाथ मिलाते हें, और नतीजे में असम दहल उठता है................. बस हो गया, राजनीति की ज़मीन तैयार हो गयी.
राजनीति............. राजनीति......... सिर्फ़ राजनीति.?
जै हिंद

( Posted: Friday , October 31, 2008 at 00:44 )        

msbohra जिस देश मे प्रधानमंत्रिजी की नींद एक अल्पश्नख्यख के विदेश म आतनकवाद के आरोप मे गिरफ़्तार होने पर ही उड़ जाती है,मगर सेकड़ो किसानो के आत्महत्या करने पर जू भी नही रेंगती हो!उन्हे क्या फ़रक पदेगा एसए विषफ़ोटो मे आम आदमी के मरने पर?
इनके स्वयं के भाई-बंदू एसए विषफ़ोटो के शिकार हो या इनके आका शिकार होगे तभी ये कोई तोष कदम उठाएँगे.
देश मे लोकतंत्र नही है राजतंत्र है एक ही परिवार का,जबतक जनता इन्हे सहेगी तबतक एसेही म्रती रहेगी.
इस क़मेंट को एड़ीत नही करे व पूरा प्रदर्शित करे.

( Posted: Tuesday , September 30, 2008 at 07:46 )        

tpod लेखक महोदय, आप ने आतंकवाद के परिणाम को बख़ूबी चित्रित किया है. निर्दोष इंसान का ख़ून, मासूम बच्चे का ख़ून, निरीह व्यक्तियों का ख़ून. दृश्य सचमुच हृदय-विदारक है.

लेकिन आप ने हल नहीं सुझाया है. सवा सौ करोड़ से ज़्यादा की आबादी वाले देश मे हर व्यक्ति को, हर गाँव को,हर शहर को, हर नुक्कड़ को, हर सार्वजनिक स्थान को, हर इमारत को सुरक्षित बनाया जाय तो कैसे ?

मुझे नहीं लगता है की देश की इंटेलिजेंस तथा जाँच एजेंसी हाथ पर हाथ धरे बैठी होंगी. वे भरसक कोशिश ज़रूर करती होंगी.

आप को याद होगा--एक वीरप्पन को ढूँढ निकालने में वर्षों लग गये थे. चंबल घाटी के डकुओं के साथ भी ऐसा ही हुआ. अभी भी ना जाने कितने बाक़ी होंगे ! देश में नाना तरह के जघन्य अपराध अनसुलझे रह जाते हैं. जघन्य अपराधों में हत्या, बलात्कार, गंभीर रूप से ज़ख़्मी करना, डरना, धमाका ना, चोर-डकुओं की करतुतें,सफ़ेद पोश लोगों की करतुतें अपने-अपने दायरे में क्म आतंक नहीं बरपाती हैं. इसके अतिरिक्त भ्रष्टाचार तथा आर्थिक अपराध तथा जाती, धर्म, भाषा, क्षेत्रियता के आधार पर होने वाले दंगे-फ़साद भी गहरे छाप छोड़ते है. अब आप सोचेंगे की मैं इन सारी बातों की गिनती क्यों करा रहा हूँ. उद्देश्य मात्र यह है की आतंकवाद से काम गंभीर इन बातों को सुलझा पाना आज़ादी के 60 वर्षों के बाद भी संभव नहीं हो पाया है. इन सारी बातों को हर भारतीय जीवन का हिस्सा मान ही चुका है. राम-भरोसे .

मेरी समझ से तो क़ानून-व्यवस्था सख़्ती से क़ायम करने के साथ-साथ समाज के हर हिस्से से प्रबुद्ध लोगों की एक समिति बनाई जाय जो इस भयंकर आतंकवाद के कारणों का पता लगाए. ऐसा अपने देश के संसद द्वारा गठित एक व्यापक संसदीय समिति भी कर सकती है. इस तरह की समिति के सुझावों पर समुचित ध्यान देकर कारगर क़दम उठाए जाएँ.

( Posted: Tuesday , September 30, 2008 at 00:41 )        

Uttam Banerjee बिल्कुल ठीक लिखा है सिर आपने..... आपके जज़्बातों की मई क्दरा करता हूँ देश की सुरक्षा मे सेंध लगाने वाले डेहसतगर्दो को भी ये बात समझ मे आती

( Posted: Monday , September 29, 2008 at 21:51 )        

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