बृज दुग्गल
प्रीविअस पोस्ट
सोमवार, सितंबर 29, 2008 20:32s
यूं मरने के लिए नहीं हम हिंदुस्तानी
हम कहते रहें, उन्हें फर्क नहीं पड़ता, हम चिल्लाते रहें, उनकी बला से ...हमारी लाशें गिरती रहें, उन्हें कुछ लेना देना नहीं....हमारा खून सड़कों पर बहता रहे, उन्हें क्या -उनके लिये तो हमारे खून की कीमत पानी से भी कम है ....बात चाहे अहमदाबाद बलास्ट की हो या जयपुर धमाकों की...दिल्ली में हुए धमाके हों या असम का सीरियल बलास्ट ....हमारी जान की कीमत, हमारे नेताओं के लिए छींक आने से ज्यादा कुछ नहीं....असम में 30 अक्तूबर को हुए सीरियल धमाकों में भले ही 60 से ज्यादा की जान चली गई हो...भले ही 200 से ज्यादा लोग घायल हो गए हों, लेकिन यकीन मानिए कोई फर्क नहीं पड़ेगा ...सबकुछ वैसे ही चलता रहेगा ...और हां, एक बार फिर मैं आपसे कहता हूं-आप भी कभी भी शिकार बन सकते हैं।
मानसिक रूप से खुद को तैयार कर लिजिए। बहुत मुमकिन है एक बार फिर आपके शहर में ब्लास्ट हो और अबकी बार आप शिकार बन जाएं -आज जानते हैं -आप हिंदुस्तानी हैं और इस वक्त हर हिंदुस्तानी सिर्फ और सिर्फ मरने के लिए है ...खैर ये तो बात है असम ब्लास्ट की लेकिन मैं आपको थोड़ा सा पीछे लिए चलता हूं ....
वो 13 सितंबर, शनिवार की शाम थी ...हम सब अपने काम में लगे थे। अचानक खबर आई कि करोल बाग में बम धमाका हुआ है....शुरुआत में पुलिस ने कहा कि किसी ऑटो में लगा सीएनजी सिलेंडर फट गया है लेकिन जल्द ही ये साफ हो गया कि दिल्ली सीरियल बम ब्लास्ट से दहल गई है ....करोल बाग, क्नॉट प्लेस और ग्रेटर कैलाश।
आतंकवादियों ने हिंदुस्तान की ताकत की निशानी राजधानी दिल्ली को निशाना बनाया था....अरबों के इंटेलिजेंस बजट और सुरक्षा एजेंसियों के तामझाम को धता बताकर, आतंकवादियों ने हिंदुस्तान के दिल पर चोट की थी....हम सब ब्लास्ट की कवरेज में लगे थे.....तभी, सभी न्यूज़ चैनलों पर फ्लैश हुआ कि इंडिया गेट पर आतंकवादियों ने एक बच्चे के जिस्म पर बम बांध दिये हैं....खबर देखते ही जिस्म में 1000 वोल्ट का करंट दौड़ गया...समझ ही नहीं आया कि ये क्या हो रहा है.....मानों दिमाग ने काम करना ही बंद कर दिया।
पत्रकारों को काफी मजबूत दिल वाला माना जाता है लेकिन इस बार बरबस ही आखों से आंसू निकल आए....क्या ये आतंकवादी अब बच्चों का भी इस्तेमाल करेंगे। इस सवाल के साथ देश के हुक्मरानों, पुलिस और इंटेलिजेंस एजेंसियों के प्रति गुस्सा भर आया.....हालांकि जल्द ही ये खबर गलत साबित हो गई। पता चला कि उस बच्चे ने, आतंकवादी को बम रखते देखा था जिसे गलती से ऐसा समझ लिया गया था कि उसके जिस्म पर बम बंधा हुआ है । दिलवालों की दिल्ली को यूं बेबस देख दिल रो रहा था ...मगर हर हिंदुस्तानी की तरह मैं तब भी बेबस था और अब भी मेरे हाथ में कुछ नहीं है।
जैसाकि अक्सर होता है ....दिल्ली ने दिलेरी दिखाई और ब्लास्ट के जख्म धीरे-धीरे भरने लगे ....तभी आया 27 सितंबर ....एक बार फिर शनिवार... 13 सितंबर को हुए सीरियल ब्लास्ट के बाद, कुछ आतंकवादियों को एनकाउंटर में मार गिराया गया ....दिल्ली से लेकर मुंबई तक कुछ गिरफ्तारियां भी हुईं .....लेकिन आतंकवादियों का दुस्साहस देखिए ....सिर्फ दो हफ्ते के भीतर उन्होंने दिल्ली को दूसरी बार निशाना बना डाला ...अबकी बार उन्होंने छुपाकर कहीं बम नहीं रखे....इस बार उन्होंने बम फेंके....दिल्ली के एक भीड़ भरे बाजार महरौली में ....दो लोगों की मौत हो गई और कई लोग घायल हुए।
कहा गया कि ये कम क्षमता वाला धमाका है -लेकिन यहां बात लो या हाई इंटेसिटी की नहीं है -यहां बात है आतंकवादियों की हिम्मत की (वैसे आप इसे हमारे हुक्मरानों और पुलिस की नाकामी भी कह सकते हैं )...ये जानते हुए भी कि हर पल पुलिस उन्हें ढूंढ रही है उन्होंने एक बार फिर दिल्ली पर ही हमला किया। इतना ही नहीं, हमला करने का अंदाज देखिए। 2 आतंकवादी मोटरसाइकिल पर आए,बम फेंका और इत्मिनान से निकल भागे। सोचिए क्या कहें इसे।
ये ब्लास्ट दो वजहों से चर्चा में रहा। पहला, आतंकवादियों की हिम्मत दूसरा सड़कों पर बहता आम हिंदुस्तानी का खून। जिन लोगों ने भी महरौली ब्लास्ट की तस्वीरें देखी हैं वो भला उस दिल दहला देने वाले दृश्य को कैसे भूल सकते हैं जिसमें सड़क पर एक बच्चे की खोपड़ी पड़ी है और पास ही इंसानी लहू बह रहा है ...पुलिस और लोगों के अलावा चारों तरफ अगर कुछ था तो वो था -खौफ। सड़कों पर बहते खून के वो थक्के देखकर एकबार फिर मैं दहल गया। बरबस ही एक बार फिर आंखें नम हो गईं ...मैं जानता हूं कि मेरी ये आवाज आतंकवादियों तक नहीं पहुंचेगी लेकिन एक सवाल जो मैं उस वक्त भी उनसे पूछना चाह रहा था और जो मैं आज भी पूछना चाहता हूं-आखिर ब्लास्ट में मारे गए उस बच्चे की क्या गलती थी - उसने तो तुमसे सिर्फ इतना ही कहा था न-अंकल आपका बैग गिर गया।...खैर, जवाब न मिलना है और न ही मिलेगा लेकिन एक बात सच है वो ये कि अब हम कहीं भी महफूज नहीं।
सवाल ये कि अब क्या होगा हमारा। आखिर क्यों बार-बार बह रहा है सड़कों पर हमारा खून। क्या इसलिए कि हम आम हिंदुस्तानी हैं। क्या इसलिए क्योंकि देश के हुक्मरानों, पुलिस के आला अफसरों की तरह हमारे पास सुरक्षा का वो कवच नहीं,जिसे आतंकवादी तोड़ न सकें। क्या हमारी जिंदगी यूं सड़कों पर मरने के लिए है। क्या हमारा लहू इतना सस्ता है कि यूं सड़कों पर बहता रहे। देश का हर नागरिक जानना चाहता है -आखिर कब कब टूटेगी देश के हुक्मरानों की कुम्भकर्णी नींद...आखिर किस जगह महफूज है आम हिंदुस्तानी। बस में, ट्रेन में,सुनसान जगह पर या भीड़ भरे बाजार में ....आतंकवादी जहां चाहते हैं, बेबस भारतीयों का खून सड़कों पर दिखाई देता है। वैसे अब वक्त आ गया है-हर हिंदुस्तानी साफ-साफ पूछ रहा है। अगर पुलिस कुछ नहीं कर सकती तो क्या हम धमाकों के आदी हो जाएं।....आपके जवाब का सबको बेसब्री से इंतजार है। जानता हूं ये मेरे दिल का गुस्सा है...वैसे ये मेरे नहीं, हर भारतीय के जज्बात हैं जो चाहकर भी बाहर नहीं आ पाते।
इससे पहले कि मैं अपनी बात खत्म करूं... कुछ सवाल और हैं जो मैं देश के सवा सौ करोड़ लोगों की तरफ से देश के हुक्मरानों से पूछना चाहता हूं। वैसे लोग जानते हैं आप बहुत बिजी हैं... लोग जानते हैं आपका हर पल बेहद कीमती है... लेकिन अपने कीमती वक्त में से कुछ मिनट निकालकर, बस एक बार ये बता दीजिए कि क्या आप जानते हैं कि हर ब्लास्ट के बाद सड़कों पर बहने वाला खून किसका होता है ....हर धमाके बाद हाथ जोड़े बेबस खड़े इंसान को तो खैर आप पहचानते ही नहीं होगें...आपको तो वो खामोश चीखें भी नहीं सुनाई देती होंगी जो हर धमाके के बाद सबको सुनाई देती हैं।
हम जानते हैं हमारे इन सवालों से आपको तकलीफ हो रही होगी... हम जानते हैं आपको देर हो रही होगी... लेकिन जाने से पहले बस एक बात सुन लीजिए...हर धमाके के बाद सड़कों पर बहने वाला लहू किसी हिंदुस्तानी का ही होता है। वो खामोश चीखें भी आम भारतीय की ही होती हैं ....पर हम आपको ये सब क्यों बता रहे हैं...आप तो इनमें से किसी से भी वाकिफ नहीं होंगे ....वैसे आप वाकिफ हो भी कैसे सकते हैं ...
आप जिस चारदीवारी के पीछे रहते हैं वहां तो चिड़िया भी नहीं फटक सकती...लेकिन ये आपकी तरह सुरक्षित नहीं....ये तो आम हिंदुस्तानी हैं न। हम जानते हैं आप जवाब नहीं देंगे। लेकिन अपने जवाब से पहले हमारी बात सुन लीजिए - आम हिंदुस्तानी यूं मरने के लिए नहीं है।
पोस्टेड बृज दुग्गल at 20:32s 9 कमेंट्स
टोटल कमेंट्स
पोस्टेड बी Prem
आप भी जानते हैं और नेता-लोग भी जानते समजते हैं के एक हज़ार साल से हिंदुस्तानी को तो मरने की आदत हो गयी है, उसकी मानसिकता हो गयी है मरने की और गुरु-लोग भी ऐसी बातें ही सिखाते हैं. कुछ लोग मारना जानते हैं और कुछ लोग मरना जानते हैं. बस . आप क्यों परेशान हैं. ...
पोस्टेड बी saifi
मुझे आज भी याद है जब मैने थे दी देली मा सेरियल बूम ब्लास्ट हुआ हा तो मा सोक्क रे गया और लगा हो सकता है मा भी इसका सिकर हो गया होता या जो लोग इसके सिकर हू हा उन्हे खबार मे देखकर लगातार 3घंटे तक एक जगह पर उसे देखता रहा . और मुझे नही लगता किसी इंडियन को ये ख़बर देखकर अच्छा लगा हो कुछ अच्छा करने का दिल चाहा हो जिसने इसे अचानक सुनो हो. पर मेरी समाज मे ये नः आता की हमारे देश का वो मंत्री ज के उपेर देश की सुरखा की जीमदारी है वो ईसब कैसे सुकार सोक्क नही होता और ख़बर को सुनने के बाद 3 बार अपने ड्रेस्स को चांगे करते की मेरे ख़्याल से तो या तो मंत्री जी को पेहले से ही पता था की यहा बूम विस्फोट होगे तभी तो वो एअक दूं नोर्मल दिखे और सिदे पर झा बूम विकफ़ोट हुआ यहे हाथ हिलकेर ज़ञता को ब्दैया दे रहे था मे अपने दोस्ते से खने चटा हू ज़रा इसपर गौरे करे क्यो औम भी इसे ही करते अगर अकनक इतने बड़े बूम विचफ़ोट की ख़बर सुनते तो हमारे मंत्री जी करते है तो इसका क्या मतलब है ............. खाए ये दल मा कुछ कला तो नही....... ...
पोस्टेड बी saifi
पहले तो मे ये केहना चौगा की इज़ कल हमारे देश मा लगातार बूम विस्फोट हो रहे है. अगर य विकफ़ोट सिर्फ़ आटंगवदी कर रहे है ट वो अचनत जब हमारे देस मा चुनाव का समय करेब है तभी क्यो ज़्यादा कर र है ये बात सोचने की है अगर गोरे से सोचे तो लगता है ये चुनोव की वजह से हो रहे है आग इसका इस मतलब किसी राजनटिक पार्टय से है तो वो कों सी हो सकती है किसको इसका फ़ायदा है. आख़िर क्यो अब लगता बूम विस्फोट हो रहे है इसमे ......................... ...





























पोस्टेड बी sanjay
मेरे देशबा सिओ हिम्मत से काम लो,उस ईश्वर प र बिश्वास र खे बो रा ह ज रु र दिखाएगा, इस स सा र को र च ने बाले से ज़्यादा को न स म झ दा र हो स क ता हे, बिश्व के कल्याण की कामना क रे. ईश्वर स ब को शांति दे. ...
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